जयशंकर प्रसाद के जीवन और उनके युग पर केंद्रित उपन्यास ‘कंथा’ का अंश

 जयशंकर प्रसाद के जीवन और युग पर केंद्रित उपन्यास ‘कंथा’ का अंश
                मुंबई के मासिक ‘नवनीत’ में धारावाहिक प्रकाशन जारी
             दिसंबर 2010 अंक में प्रकाशित आठवीं किस्त                                                                      
                                                                        कंथा
                                                        
                                                        श्याम बिहारी श्यामल
बैठकखाना। सामने बैठे हैं दास। प्रसाद की वाणी में हाहाकार है! व्यतीत दुःख-प्रसंग सामने जैसे दृश्यमान हो रहे हों: मित्र, इस दौरान मुझे कुछ ऐसे अनुभव हुए हैं जिन्होंने मेरी जीवन-दृष्टि को झकझोरते हुए उलट-पलटकर कर रख दिया है। मैंने यह अनुभूत किया है कि जीवन में किसी भी तरह का अनुशासन-भंग भविष्य की भूमि को निश्चित तौर पर क्षति पहुंचाता है। तुमसे भला क्या छुपा है! अपने मचलते मन को निर्बन्ध छोड़ रंगीन आंधियों पर सवार हो-होकर मैंने कोई कम उड़ान नहीं भरी है! एक पूरा दौर जहरीली रंगीन-रेखाओं पर भटकते हुए बर्बाद कर दिया... इसी संदर्भ में तुम्हें आज मैं यह बता दूं कि मुझे अपने ऐसे तमाम विचलनों का पूरा मूल्य चुकाना पड़ गया। एकदम पाई-पाई। मैंने यह सिद्ध होते देखा है कि हर क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया वाला वैज्ञानिक नियम जीवन-जगत में दैनिक और नैतिक धरातल पर भी सर्वथा अक्षरशः लागू होता है। देखो, मैंने स्वयं को दुर्बल रेखाओं पर विचरने की जरा-सी छूट दी थी, मुझे इसका मूल्य लगातार दो बार अपनी अर्द्धांगनियों की चिता सजा-सजाकर चुकाना पड़ा। मैं उस रात की अपनी अनुभूति की दग्धता का वर्णन करने में स्वयं को आज असमर्थ पा रहा हूं जिस रात अर्द्धांगिनी विन्ध्यवासिनी मुझे अधूरा कर सदा के लिए संसार से विदा हुई। मैनें उसे बिस्तर पर जिस बेचैनी में देखा, इससे मन विह्वल हो उठा। भाभीश्री तो मेरी मातृसमा ही ठहरीं। उनके सजल नेत्रों से मेरे आहत मनोभाव और मेरी टूटती हिम्मत छुपे नहीं रह सके। मुझे पुत्रवत् सम्भाल लिया। पकड़े-पकड़े लेकर बाहर आ गयीं। उन्होंने मुझे यहीं इसी बैठकखाने में चौकी पर बिठा दिया और मुझे ढांढ़स देने लगीं कि बहू की हालत उतनी खराब नहीं जितनी मैं समझ रहा हूं! मुझे धैर्य धारण करने को कहा और भीतर स्थिति सम्भालने चली गयीं। मुझे लग गया था कि उसकी बीमारी नियंत्रण की सीमाओं का अतिक्रमण कर चुकी है!...
...मन में डरावनी आषंकाएं फण निकाले ऐंठ रही थीं। कभी भी सबसे अप्रिय समाचार सामने आ सकता था। वह रात कितनी काली थी! वह कालापन कैसा भयावह था! वह भयावहता कैसी श्मशानी थी! वह श्मशानपन कितना शोक-दग्ध था! वह शोक-दग्धता कैसे सरसराहट और फुंफकार से भरी हुई थी! ...और वह सरसराहट और फुंफकार ...जैसे रोम-रोम पर दंश चुभो रहे थे! तभी एक सांकेतिक घटना-सी हुई। पता नहीं किधर से एक भेंड़ा आया और आंखें तरेरता हुआ सामने से इस कमरे में आंधी-बतास की तरह घुस गया। उसकी डभकती-सी आंखें डरावनी थीं और दोनों सींगों से लेकर ललाट तक सिन्दूर टीके हुए थे। सींगों व ललाट की नुकीली लाली दहक रही थी। उसकी खौलती-सी आंखों से ताप फूट रहा था। यह दहक और ताप जैसे मुझे ही अंगार-स्पर्ष दे रहे थे। उसे देखते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गये। वह जिस तरह दरवाजे को हुरपेटता हुआ तिलमिलाता-सा आया था उसी तरह छटपट-छटपट करता दीवार- दरवाजे से टकराता-रगड़ता दूसरे ही पल स्वमेव वापस भी चला गया। मैं सिहरकर रह गया। उसी क्षण भीतर से आकर चेखुरा ने रुंधे गले से यह संवाद दिया था कि विन्ध्यवासिनी नहीं रहीं! दुर्भाग्यवश मेरी आशंका सही सिद्ध हुई थी।...
...गंगा भी मेरे मन की तरह भर आयी थी। पानी गोदौलिया तक आ गया था। चौराहे पर ही पिण्डदान तक का तृप्ति-कर्म हुआ। मैं पिण्डदान कर रहा था और चिरगांव से आकर मैथिलीशरण सामने खड़े थे। आंखें उन्हें देख तो पा रही थी किंतु चित इतना चंचल था कि मुझे यह ध्यान ही नहीं रहा कि यह कोई आस-पड़ोस का व्यक्ति नहीं बल्कि भाई मैथिलीशरण गुप्त हैं! वह पास आये। अपनी डबडबायी दृश्टि मेरी ओर उठायी और मुंह से कुछ शब्द निकाले तब मैं उन्हें गौर से देख और पहचान सका था! तुम सोचो, एक बार दाम्पत्य उजड़ा उसके बाद मुझे दुबारा घर बसाने का दबाव स्वीकार करना पड़ा। उसके बाद फिर वही वज्रपात! प्रसूति-रोग से सरस्वती भी चल बसीं। यानी यह भी विन्ध्यवासिनी के पास चली गयी! कुछ ही घंटे बाद नवजात ने भी आंखें मूंद ली। सरस्वती चिता पर लिटायी ही गयी थीं कि पीछे से नन्हे का भी शव श्मशान पर आ गया! बताओ, क्या मैं केवल दुःख झेलने और कंधों से अपनों का शव ढोने के लिए ही बना हूं! घर में हर पल लगता कि दोनों दिवंगता गृह-स्वामिनियां कभी इधर तो कभी उधर से झांक रही हैं! तुम्हें सच-सच बताऊं, मुझे जीवन से ही डर लगने लगा। घर में अपने जिस एकांत को मैं नये-नये छंदों से रागमय बनाता था वह जैसे जबड़े खोले बड़े-बड़े दांत चमकाता दहाड़ मचाता काटने दौड़ने लगा।...
...विडम्बना यह कि भाभीश्री जब कभी सामने आतीं, मेरे दुःखों को सीधे-सीधे जैसे अमान्य करतीं आगे की तरह-तरह की योजनाओं की ही बातें करतीं। यह सब मेरे लिए असह्य होने लगा। वह परिवार की दशा आदि का चित्रण करतीं और फिर घूमा-फिराकर तीसरे विवाह के लिए मेरा मन टोने लगतीं। यह स्थिति मेरे लिए दुःखदायी थी कि उन जैसा मेरा अभिभावक मेरे ही मन के घावों को जानबूझकर अनदेखा कर रहा था! मैं भला अपनी आत्मा पर कितने प्रहार सहन करता! एक दिन घर-बार छोड़ निकल पड़ा। ठीक वैसे ही जैसे मेरे मन से धैर्य हवा हो गया था। आत्मा में जैसी निर्जन वीरानी चुभी हुई थी, मन वैसे ही वातावरण को तलाष रहा था। अटकता-भटकता जाकर गुम हो गया मीरजापुर के अष्टभुजा वन-प्रदेश में। तुम्हें मैं कैसे बताऊं कि उस वन-प्रांतर में जहां पहचान-मुक्त और मुक्त-मन भटकता हुआ मैं केवल छाया-भर रह गया था, मुझे कितनी षांति मिल रही थी! यह गहराई से अनुभूत होने लगा कि विधि मुझे जैसा अकेला और निहत्था करना चाह रहा हो! बिल्कुल वैसी ही दषा में आ गया हूं और यह स्थिति उसके लिए भी सफलता-बोधक और मेरे लिए भी मुक्तिदायी! सुख का एक टुकड़ा भी पास नहीं, इसलिए दुःख के किसी एक कण के भी पास फटकने का कोई भय नहीं। अनुभूत हुआ कि सुख को षून्य कर दो तो दुःख स्वयं अप्रासंगिक और अस्तित्व-हीन हो जाता है! दुःख कुछ और नहीं, सुख की ही तो परछाईं है! जैसे ही किसी एक सुख को पास बुलाओ, वह अपने साथ स्वयं से भी बड़ी परछाईं समेटे प्रवेष कर जाता है। यानी सुख के ही साथ दबे पांव घुस आता है उससे बड़ा दुःख! यह तयप्राय है कि सुख जहां कहीं भी रहेगा, उसकी काली परछाईं डोलती हुई लम्बी होने के अवसर तलाशती ही रहेगी। हर पल, हर जुगत-जुगाड़ के साथ। इसलिए सुख को पास से हटा दो तो दुःख स्वमेव दूर हो जाता है। सर्वाधिक विचित्र अनुभव यह कि जब सुख और दुःख से मुक्ति पा लो तो चारों ओर एक अद्भुत वातवरण बन जाता है। कुछ ऐसा जैसे आनन्द अखण्ड और घना होकर दिशाकाश से चटक चांदनी बनकर बरसने लगा हो! यह चांदनी ऐसी जो सिर्फ और सिर्फ तृप्ति से भिंगोती चली जाती है! भींगना ऐसा जैसे पूरा अस्तित्व घुलता हुआ विलीन होने लगा हो। विलीनता कुछ ऐसी जैसे तृप्ति धीरे-धीरे जाग रहे आनन्द-सागर से एकसार होने लगी हो। ...और, यह तृप्ति इतनी चमत्कारी कि जिसका न कोई ओर न कोई छोर। आदि भी नहीं और अन्त भी नहीं! ...लेकिन मेरे ललाट पर आनन्द की यह लकीर लम्बी नहीं थी। भाभीश्री के स्नेहिल हाथों ने मुझे टटोलकर खोज ही निकाला। बचनू सूंघते हुए जंगल में आ गया और भाभीश्री को अस्वस्थ बता मुझे माया-मोह के जाल में बांधकर बनारस वापस ले आया। यहां आने के बाद भाभीश्री से मिलकर मेरे मन को संतोष हुआ। मैंने फिर जंगल लौटने की इच्छा जतायी तो उन्होंने बहुत पैंतरे के साथ कुछ दिन रूक जाने और पितृ-तर्पण भर करा देने की बात कही। मेरे लिए दुहरा बंधन हो गया। एक तो भाभीश्री का आदेष यों ही मेरे लिए अलंघ्य, दूसरी ओर पितरों की तृप्ति के अनुष्ठान की बात, इसके बाद मैं भला अचानक कैसे पलायन कर जाता! मैंने रुककर यह कार्य सम्पन्न करा देने का निर्णय लिया। खैर, सारा अनुष्ठान ठीक-ठाक सम्पन्न हो गया। अनुष्ठान के अंत में ज्योंही मैंने भाभीश्री के चरणों का स्पर्श किया, उन्होंने आशीर्वचन में कह दिया ‘ जिआऽ जागाऽ और वंश के विस्तार कराऽ ’! मैं अवाक्! उन्होंने यह अकाट्य तर्क दिया कि मैं यदि सचमुच चाहता हूं कि पितरों की तृप्ति हो तो मुझे इस वंश के विस्तार का दायित्व निभाना ही होगा! इसके बाद मेरा कोई तर्क नहीं चला। इस तरह मेरे संन्यास का सत्यानाश हो गया! तुम लापता रहे और इस दौरान मेरी तीसरी शादी भी हो गयी! अब आगे देखो, क्या-क्या देखना पड़ेगा...
मूर्तिवत् बैठे दास हल्के हिले, ‘‘ मित्र, दुःख का सागर तो तुम पराक्रमपूर्वक जीत आये हो!...अब तुम्हें कुछ अप्रिय नहीं देखना-सहना है, बल्कि दुनिया ही तुम्हें देखेगी! ’’
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मसूरी से लौटते हुए दास के मन में एक स्वर्णिम-सपनीली योजना-संकल्पना! वह यह कि बनारस में एक कला संग्रहालय की स्थापना हो! इस पर विमर्ष के लिए वे सरायगोवर्द्धन पहुंचे। बैठकखाने में प्रेमचन्द और प्रसाद बैठे बतियाते मिले।
दास को देख दोनों प्रसन्न हो उठे। पास बैठते ही प्रेमचन्द ने मुस्कुराते हुए पूछा, ‘‘ बन्धु, हमलोग एक नयी प्रस्तावित कथा-पत्रिका के नाम पर चर्चा कर रहे हैं... ‘हंस’ नाम पर आपकी क्या राय है? आप अपना दृष्टिकोण बताइये... ’’
‘‘...‘हंस’ तो बहुत ही बढ़िया नाम है... इस नामकरण पर तो प्रसाद जी से मेरी चर्चा हो चुकी है... उन्होंने यह नाम बहुत ही सटीक चुना है...’’
‘‘ इसके बारे में आप अपने कोई तर्क देना चाहेंगे या सिर्फ इसीलिए अच्छा मान रहे हैं क्योंकि यह नाम प्रसाद जी ने सोचा-खोजा है... ’’ प्रेमचन्द की मूंछों के नीचे बारीक मुस्कान खिल गयी।
‘‘ मुंषी जी, कुछ तो ऐसा मानसिक उपक्रम अवष्य है कि मेरा मित्र जो भी कुछ कह देता है वह मेरे लिए विशिष्ट अर्थगर्भी हो जाता है... आखिर शब्द का अर्थ-गुरुत्व तो प्रयोक्ता के आचरण व प्रभाव से भी बढ़ता और घटता है! ’’ मुंशी जी ने आंखें गड़ाते हुए ताका। दास स्वयं को कुछ और खोलने लगे, ‘‘ हां! मैं ऐसा मानता हूं कि शब्द को अर्थ शब्द-कोष से कहीं अधिक प्रयोग करने वाले के व्यक्तित्व से प्राप्त होता है... अब जैसे यही देखिये न कि महात्मा बुद्ध की जो शिक्षा है या आज जो इसकी अर्थ-ध्वनि या भाव-गरिमा है, क्या यह तब भी वही रह पाती जब इसका प्रतिपादन किसी सामान्य व्यक्ति ने किया होता! आप सोचकर स्वयं अनुभूत कीजिये बुद्ध की शिक्षा के शब्द क्या उतनी ही अर्थ-ध्वनि उत्पन्न करते हैं जितनी शब्द-कोष के हिसाब से उन्हें करना चाहिए? बेशक सच्चाई कुछ और है! बुद्ध के शब्द-शब्द इसलिए विशिष्ट अर्थ-प्रभाव सृजित कर पा रहे हैं क्योंकि इनमें उनका आचरण और व्यक्तित्व प्रतिबिम्बित है, इसलिए प्रभावान्विति है विशिष्ट.. पल भर में विशिष्ट अनुभूति-आलोक से संपन्न कर देने वाली!’’
प्रेमचन्द ने आंखें मूंद ली। मनन-मुद्रा। प्रसाद मौन। दास भी चुप। कुछ ही अंतराल के बाद प्रेमचन्द ने आंखें खोली, ‘‘ भाई दास जी! आप भी कम गम्भीर चिन्तन नहीं करते! तभी मैं कहूं कि प्रसाद जी के इतने अंतरंग आखिर आप ही क्यों हैं! आपदोनों में यह एक समानता तो आज मुझे समझ में आ गयी... ’’
दास झेंपने लगे, ‘‘ भाई साहब, आप मेरे बारे में कोई भ्रम न पालें... खरबूजा को देखकर खरबूजा रंग बदलता ही है... यह सम्भव है कि प्रसाद जी के साथ रहने के चलते कभी-कभी मैं भी कोई छोटी-मोटी बौद्धिक उछल-कूद करता दिख जाऊं लेकिन इससे यह निश्कर्श निकाल लेना सही नहीं होगा कि मैं भी कोई गम्भीर चिन्तक हूं... ’’
प्रसाद का मौन हल्के हिला, ‘‘ भई, गम्भीर चिन्तन छलका कर साधारण चर्चा को भी गम्भीर दषा में पहुंचा ही चुके हो... अब तुम्हारे गम्भीर चिन्तक होने का भला दूसरा और क्या प्रमाण चाहिए! ’’
प्रेमचन्द ठठा पड़े। प्रसाद आंखों में ही मुस्कुराये। दास झेंप गये और प्रसाद की ओर शिकायती लहजे में ताका, ‘‘ अच्छा! तो अब तुम मुझे बनाने लगे! ’’
‘‘ मित्र, तुम्हें क्या बनाना, तुम तो रेडीमेड हो! ’’ प्रसाद ने तीर छोड़ा।
‘‘ रेडीमेड कह रहे हो या रेडीमैड ? ’’
‘‘ मैं कोई सदा सत्य बोलने वाला थोड़े ही हूं! कभी-कभी तो सादा सत्य बोल ही जाता हूं, उसमें मिलता-जुलता रंग भर लेना होता है... ’’ प्रसाद की बात पर प्रेमचन्द के ठहाके में और गति आ गयी। इस बार दास भी खुलकर हंसने लगे। प्रसाद मंद-मंद मुस्कुराते रहे।
गौड़ भी आ गये। हंसी-ठठा का माहौल देख उन्होंने खड़े-खड़े मुंह चुनियाया, ‘‘ आप लोग तो खुद दांत चमका रहे हैं, लगता है अब यहां मेरी कोई उपयोगिता ही नहीं! ’’
प्रेमचन्द खड़े हो गये। सस्नेह हाथ पकड़ उन्हें साग्रह अपने निकट बिठाया, ‘‘ अरे नहीं भाई! हंसी-ठठा की वह धार तो गलती से फूटी है... आप अपने रोजगार पर कोई खतरा न महसूसें... हमें पता है, क्लासिक हंसी तो आपके बकवास में ही छुपी है... ’’
‘‘ ...हंसी-ठठा की यह धार गलती से फूटी है ? यों ही ऐसा कैसे हो सकता है, हंसी कोई कविता-कहानी तो है नहीं कि जब मन तब यों ही फूटती चले! अवश्य ही कहीं न कहीं कोई गड़बड़ी होगी! ’’ उन्होंने बारी-बारी से तीनों की ओर निरीक्षणी दृष्टि दौड़ायी, ‘‘ हंसी बहुत ऑरिजनल थी, कहीं ऐसा तो नहीं कि आपलोगों ने आपस में एक-दूसरे को ध्यान से देख लिया है ? ’’ बोलकर गौड़ संजीदा।
प्रेमचन्द फिर ठठा पड़े। प्रसाद ने सिर हिलाया,‘‘ वाह गुरु! हम सबके हास्यास्पद बतावत हउवाऽ तूंऽ ? हमन्ने के चेहरा हास्यास्पद हौऽ ? ’’
गौड़ ने पूछा, ‘‘ काहे नहीं? तूं तीनों लोगन के चेहरा हम्मर थोबड़ा से मिलत नाऽ हौ?’’
सभी एक साथ ठठा पड़े। गौड़ भी।
माहौल थिर होने लगा। प्रेमचन्द ने गौड़ से आग्रह किया, ‘‘ अइसन हौ गौड़ जी, तूं एक ठे बात बतावाऽ... ’’
‘‘ काऽ बतायीं ? अपने मन से कुछ बतावल शुरू कर दीं? अरे, कुछ पूछाऽ तब्ब तऽ कुछ बताईं... अपने मन से कौन बात बता दीं ? ’’
प्रेमचन्द ने हाथ जोड़ लिये, ‘‘ यार, अब और हंसा देंगे तो पेट फट जायेगा... ’’
‘‘ तो इससे तो हिन्दी साहित्य को इकट्ठे सारा खजाना हाथ लग जायेगा...’’ सबने हंसी के नये विस्फोट की आषंका के साथ ताका। गौड़ ने बात पूरी की, ‘‘ भाई, प्रेमचन्द का पेट यदि हंसते-हंसते सचमुच फट भी जाए तो क्या होगा ? हिन्दी साहित्य को कम से कम दस-बीस दर्जन कहानियों और दो-चार दर्जन उपन्यासों की तो एकमुश्त आमद हो ही जायेगी न ? ’’ ठहाके ने फिर छत और दीवारों को हिलाकर रख दिया। गौड़ के चेहरे पर हंसी की कोई हल्की लकीर भी नहीं।
हंसते-हंसते प्रसाद बेहाल। हाथ पकड़कर उन्हें रोका, ‘‘ भाई गौड़ जी, अब आप यह अत्याचार बंद कीजिये... अब हम पर रहम कीजिये... ’’
‘‘ आपलोग पर करूंगा रहम, तो आपलोग तुरंत कर देंगे पूरा माहौल गरम!...’’ गौड़ ने ‘नहीं छोड़ूंगा’ वाले अंदाज में सिर हिलाया।
‘‘ पेट में दर्द हो गया...अब एकदम न हंसाइये...बस!’’ प्रेमचन्द ने हाथ उठा दिये।
गौड़ का लहजा समझाने वाला हो गया, ‘‘ मैं यदि जरा-सा कमजोर पड़ गया तो दास जी से तो नहीं किंतु...’’ उन्होंने प्रेमचन्द और प्रसाद की ओर बारी-बारी से ताकते हुए सिर हिलाया, ‘‘ आप दोनों से भारी खतरा है... आप दोनों को यदि हावी होने का मौका मिल गया तो यहां का माहौल देखते-देखते दुःख-दर्द और आंसू-रुलाई से छलछला उठेगा... प्रसाद जी करुणालय पैदा कर देंगे तो प्रेमचन्द जी सेवासदन की छत हिलाने लगेंगे... ऐसे में यहां मैं और दास जी जैसे बेगुनाह फंसकर रह जायेंगे... ’’
सामूहिक हंसी हिचकोले लेने लगी। प्रसाद उठ खड़े हुए, ‘‘ ऐ भाई, लगता है जान बचाने के लिए यहां से अब कहीं पलायन ही करना होगा ’’
गौड़ ने दहला मारा, ‘‘ व्यंग्य का यदि यह असर है तो इस इलाके में आपकी कविता के क्या जलवे होंगे! सोचिये, आपकी ही तरह यदि आपके पड़ोसी भी जान बचाने के लिए यही विकल्प अपनाना चाहें तो इतनी बड़ी पीड़ित पलायित आबादी को कौन कहां शरण देगा? ’’
गुदगुदी सबके पेट के भीतर हंसिये की तरह छट्-छट् छट्-छट् घूमने लगी। सबने अपनी-अपनी कमर पकड़ ली। आंधी झेलते पेड़-पौधों की तरह तीनों मचलते रहे।
गौड़ ने कुछ देर सप्रयास मुंह बंद रखा तो माहौल सहज हुआ। प्रेमचन्द ने धीरे-धीरे बोलते हुए गौड़ का ध्यान खींचा, ‘‘ भई, ऐसा है कि नयी पत्रिका के संदर्भ में ‘हंस’ जो नाम है उसे लेकर मेरे मन में कुछ दुविधा उत्पन्न होने लगी है... ’’
‘‘ आपके मन में भला दूसरी और क्या चीज पैदा हो सकती है? ’’ गौड़ धीरे से बोलकर सम्भल गये। सबने उनकी ओर ससंषय ताका। उन्होंने संकेत में आगे अब और कुछ न बोलने का आष्वासन दिया।
प्रेमचन्द ने बात को आगे की ओर बढ़ाया, ‘‘ ...‘हंस’ नाम में दरअसल एक आभिजात्य है... असल में हंस कोई सहज साधारण नहीं, बल्कि बहुत विशिष्ट पक्षी है... ’’
दास ने तर्क रखा, ‘‘ ...आपकी पत्रिका के दायित्व भी तो विशिष्ट होंगे ...यह धनिया-हल्दी के भाव छापने वाली साधारण उपयोग-प्रयोग की पत्रिका तो होगी नहीं न! हंस की स्थापित पहचान नीर-क्षीर विवेक की ही है... यही विवेक आपकी पत्रिका या उस समकालीन लेखन-प्रयास के आधार-सिद्धान्त भी तो होंगे जिसे आप इसके पृष्ठों के माध्यम से प्रकाश में लायेंगे...! ’’
‘‘ मैंने किसी हंस को दूध और पानी अलग-अलग करते अपनी आंखों तो नहीं देखा ...परंतु कृप्या मुझे एक जानकारी दीजिये..’’ गौड़ ने मुंह खोला तो पहले सबने संदेह से देखा किंतु कुछ ही क्षण में सभी आश्वस्त कि अब वे संजीदगी से कुछ पूछ रहे हैं। उन्होंने अपना सवाल रखा, ‘‘ हंस करता क्या है? दूध और पानी को अलग-अलग करके छोड़ देता है या दूध या पानी में से किसी एक अथवा दोनों पर हाथ भी साफ करता है? ’’ सबने अपनी-अपनी छूटती हंसी को दबोचने की कोशिश शुरू कर दी। गौड़ अपने सवाल को अलग-अलग कोण से खोलते रहे, ‘‘ यदि वह नीर-क्षीर विवेक दिखाकर दोनों या किसी एक भी आइटम को हाथ से निकल जाने देता हो तब भी उसकी समझदारी और व्यावहारिकता पर मुझे गहरा संदेह ही रहेगा... भला दूध हो या पानी, मुफ्त में मिली किसी भी चीज को छोड़ना चाहिए? ’’
सबने हंसी को नियंत्रित रखा। दास ने प्रेमचन्द से प्रश्न किया, ‘‘ मुंशी जी, आपके दिमाग में यदि ‘हंस’ के आभिजात्य के विपरीत सहज-सामान्य का बोधक कोई नाम हो तो बताइये, इसी पर सामूहिक चर्चा हो जाये... ’’
‘‘ मैंने तो अभी तक ऐसा कुछ नहीं सोचा... ’’ उन्होंने इनकार में सिर हिलाया।
‘‘ अभिजात पक्षी ‘हंस’ के मुकाबले सहजता और साधारणता का बोधक एक नाम मेरे दिमाग में तो अभी फुदक रहा है... आपलोग मेरी समझदारी पर भरोसा बांधें तो इसे दिमाग से निकालकर मैं अभी सामने खड़ा कर दूं...’’ गौड़ ने विनम्रता से ताका।
‘‘ हां! हां! क्यों नहीं... ’’ सबने एक साथ कहा।
‘‘ सवर्ण-श्वेत ‘हंस’ को कड़ी चुनौती देने का काम तो अवर्ण-अश्वेत ‘कौआ’ ही कर सकता है.. क्यों नहीं पत्रिका का नाम ‘हंस’ की जगह ‘कौआ’ ही रख लिया जाये!..’’
जोरदार ठहाका! जारी ठहाके पर ही उन्होंने आगे ठोंका, ‘‘ सहमति हो तो इसके लिए मैं तुरंत एक मुफ्त स्तम्भ ‘कांव-कांव’ की घोशणा करूं... ’’ गौड़ एकदम गम्भीर।
फिर ठहाका। आगे की बात शोर में डूब गयी।
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दास दूसरे दिन नारियल बाजार पहुंचे। प्रसाद अकेले ही बैठे मिले, ‘माधुरी’ के पृष्ठों में खोये हुए। देखकर खुश हुए। दास बैठते हुए हंसे, ‘‘ गौड़ जी तो कभी-कभी अति ही कर देते हैं... कल न तो प्रेमचन्द जी की बात अंजाम तक पहुंची न मैं ही अपनी योजना सामने रख सका... हंसी-ठठे के तूफान में सारी बातें हवा हो गयीं... ’’
प्रसाद ने पत्रिका के पन्ने बंद कर दिये, ‘‘ ठीक है भई! चाहे जैसे भी मिले या जिस किसी भी मूल्य पर, यह हंसी-खुषी अनमोल है... बल्कि यही या ऐसे ही पल जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं... ’’
‘‘ लेकिन किसी भी चीज की अति तो घातक है... ’’
‘‘ निस्संदेह! इसलिए हंसी-खुशी के विरोध की अति से बचो!’’
दोनों हंसने लगे।
दास ने बनारस में कला संग्रहालय की स्थापना की अपनी इच्छा-संकल्पना सामने रखी। प्रसाद चमत्कृत। प्रसन्नतापूर्वक पूरजोर स्वागत किया, ‘‘ वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है... काशी में एक ऐसे संग्रहालय का होना नितांत आवश्यक है... जो नगर स्वयं इतना प्राचीन हो वहां ऐसा कोई प्रयास अवश्य होना चाहिए...’’
इस जोरदार अनुमोदन ने दास का उत्साहवर्द्धन किया। आनन-फानन में गोदौलिया चौराहे पर दषाश्वमेधघाट की ओर जाने वाले रास्ते पर एक कोठी में उपयुक्त स्थान का भी पता लग गया। दास के साथ प्रसाद ने जाकर इसका मुआयना किया और सहमति जता दी। तय हुआ कि पांच दिनों बाद अंगरेजी नववर्ष के पहले दिन अर्थात् पहली जनवरी को ‘भारत कला परिषद्’ की विधिवत् स्थापना की जाये।
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प्रसाद नियत समय से काफी पहले ही पहुंच गये। साथ में चेखुरा भी। उसके हाथ में लम्बा-सा झोला। बाहर कुर्सियां सजी हैं। दो-चार लोग इंतजाम करने में व्यस्त। प्रसाद भीतर गये। दास लकड़ी के आलमारीनुमा फ्रेम में प्राचीन मूर्तियां सजाने में तन्मय। बहुत सतर्कता से आहिस्ते-आहिस्ते, ताकि किसी भी तरह मूर्तियों में कोई बलाघात न हो। प्रसाद को आया देख वे उठने लगे। प्रसाद ने रोका, ‘‘ तुम अपना काम बाधित न करो... लगे रहो... लगे रहो...! मैं यहां आकर कुछ काम बढ़ा ही रहा हूं... ’’
दास के हाथ में एक भग्न मूर्ति। दृष्टि उसके टूटे हुए हिस्से पर। चेहरे पर कसक के चिह्न। प्रसाद की बात पर वे चौंके, ‘‘ क्या कहा! काम बढ़ाने आये हो? मतलब ? ’’
प्रसाद ने पीछे मुड़कर चेखुरा से झोला ले लिया। दास वहीं से कभी प्रसाद, तो कभी झोले को जिज्ञासा के साथ ताकने लगे। उन्होंने झोले से एक-एककर दो मूर्त्तियां निकाल ली।
‘‘ वाह! वाह! मित्र, वाह!’’, दास देखकर चहक उठे, ‘‘...कहां से हाथ लगीं ऐसी अनमोल मूर्त्तियां ? ’’
प्रसाद उनसे थोड़ी दूरी पर फर्श पर बैठ गये। एक मूर्त्ति सामने रखी और दूसरी हाथ में ही पकड़े-पकड़े बारीकी से अवलोकन करते बताने लगे, ‘‘ देखो मित्र! यह है भगवान श्रीकृष्ण के बालपन की दुर्लभ छवि... माखनचोर वाली! ...देखो न, इसकी तराश में कितनी धार और गढ़न में कैसी दक्षता! मेरा विचार है कि यह मूर्त्ति कुषाणकालीन रचना है...’’
‘‘ इसका काल-निर्धारण तुम किस आधार पर कर रहे हो? ’’ दास खिसककर पास आ गये। वे भी ध्यान से मूर्त्ति पर दृश्टि डालने लगे।
‘‘ कोई न कोई दृष्टिकोण तो है ही और तुम विश्वास कर सकते हो कि यह निहायत ही निराधार कदापि नहीं होगा! ’’ प्रसाद ने मूर्त्ति से हटाकर दृष्टि उनके मुखमण्डल पर टिका दी। दोनों मुस्कुराये। दास सिर हिलाने लगे, ‘‘ समझ गया... यह इतिहास-दृष्टि से अधिक कवि-दृष्टि भी हो सकती है... ’’
‘‘...और कहने की आवष्यकता नहीं कि कवि-दृष्टि होना ही इतिहास-दृष्टि की तरह तथ्यांगी अथवा एकांगी-भर के सर्वथा विपरीत त्रिकाल-दृष्टि होने की गारंटी है...’’ प्रसाद की मुस्कान ने ऐसा कोंचा कि दास ठठा पड़े। बहुत सम्भाल कर हाथ बढ़ाया और मूर्ति को ले लिया, ‘‘...मानता हूं, मस्तिष्क से भी ऊपर मैं सजग हृदय के स्तर से यह स्वीकारता हूं कि इतिहास का वह स्वरुप अधिक प्रभावोत्पादक होता है जो कवि अन्वेषित करता है... क्योंकि इसमें मानसिक उद्यम या ताथ्यिक अनुशीलन से भी बहुत आगे बढ़कर हार्दिक पुनर्सृजन निहित होता है... इतिहासकार काल का पाताल खोद देगा, तथ्यों का पहाड़ भी खड़ा कर सकता है किंतु तत्कालीन जन-गण-मन को मूल रूपाकार में तो कवि ही देख और पुनर्सृजित कर सकता है... दूसरे शब्दों में कहूं तो इतिहासकार इतिहास का आकलन-लेखन तो कर सकता है जबकि कवि चाह ले तो अमुक काल-खण्ड का अधिकतम सटीक पुनर्निर्माण! ’’
प्रसाद ने दूसरी मूर्त्ति उठा ली, ‘‘ बस-बस! मैंने यों ही हंसी में एक वाक्य क्या कह दिया तुमने तो इसे ऐसा पकड़ लिया कि... ’’ दास ने मुस्कुराते हुए उनके हाथ की दूसरी मूर्ति पर दृष्टि डाली। प्रसाद आगे बोले, ‘‘...इतिहास पर कोई भी काम करे, अंततः वह इतिहासकार ही हुआ,मित्र! इसमें अब किसी तरह का अंतर्विभाजन या परस्पर टकराव जगाने की आवश्यकता नहीं... इतिहास पर होने वाला हर काम तथ्याधारित ही होना चाहिए... इतिहास पर कवि-लेखक का काम भी इतिहास-कर्म का ही विस्तार है, भाई! ’’
‘‘ चलो, हुआ! मेरी तुमसे कोई आधारभूत असहमति नहीं! तुम जो कहो, वह अंततः मुझे स्वीकार ही है और सम्भवतः आगे भी ऐसा ही होता रहे... और तो और, यह सहमति आंख मूंदकर नहीं बल्कि कुछ और पुष्ट तर्कों के साथ ही होगी... चलो, अब बताओ कि यह दूसरी मूर्ति क्या है, जल्दी बताओ...’’ दास की आंखों से तीव्र जिज्ञासा छिटकने लगी।
प्रसाद ने इनकार में सिर हिलाया, ‘‘...ऐसा भी भला क्या विमर्श, जिसमें दूसरा पक्ष आत्मसमर्पणवादी समर्थन के साथ प्रस्तुत हो! ...वैचारिक असहमतियों से कभी बचना-डरना नहीं चाहिए... असहमतियां और तर्क-वितर्क से ही तो तथ्यों का नव्य अनुशीलन सम्भव है! अंधसमर्थन वैचारिक अंधता पैदा करेगा... इसलिए मित्र, मैं तो इससे परहेज की ही सलाह दूंगा... मैं तो यही अनुरोध करूंगा कि तुम उस हर व्यक्ति के प्रत्येक विचार पर तर्कपूर्वक ही सोचो और असहमति होने पर इसे पूरजोर ढंग से सामने रखो जिसके प्रति शुभकामना रखते हो... इसी में भला है, तुम्हारा भी मेरा भी और ज्ञान पक्ष का भी! ’’
दास अन्यमनस्क भाव से ताकते हुए रह-रहकर मूर्त्ति पर दृष्टि टिका देते रहे। यह एक स्त्री-पुरुष की युग्मद्ध मुद्रा! प्रसाद ने दास की जिज्ञासा-विकलता को समझते हुए तुरंत बात बदल दी, ‘‘ मित्र, यह युग्म ध्यान से देखो... बताओ कि इसे देखकर तुम्हें क्या लग रहा है?...’’
दास ने पहली मूर्ति को धीरे से अपने सामने रख लिया और प्रसाद के हाथ से दूसरी ले ली। वे इसे घुमा-घुमाकर देखने लगे। कुछ देर तक प्रतीक्षा करने के बाद प्रसाद ने टोंका, ‘‘...बताना चाहोगे या सुनने को ही इच्छुक हो... ’’
‘‘ इच्छुक नहीं, सुनने को विवष हूं... ’’
‘‘ मेरा विचार है कि यह गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त प्रथम और उनकी साम्राज्ञी कुमार देवी की प्रतिमा है... अब कहो तो अपने इस विचार का आधार-तथ्य सामने रखूं... ’’
‘‘ नहीं! कदापि नहीं! ...इसकी आवष्यकता तो तब न होगी जब मैं कोई प्रष्न- प्रतिप्रष्न उठाऊंगा... ’’ दास मुदित भाव के साथ दोनों मूर्त्तियां लेकर उठे और सामने की आलमारी की ओर बढ़ गये, ‘‘ चलो, तुम्हारी इसी पहल के साथ ही भारत कला परिषद् का उद्घाटन मान लिया गया! ’’ 
प्रसाद बोले, ‘‘ दोनों मूर्त्तियों के बारे में तुम अपने स्तर से अनुशीलन-कार्य करो या कराओ तो मुझे अधिक प्रसन्नता होगी... बल्कि ऐसा ही होना चाहिए ! साहित्य और इतिहास में यही मौलिक अन्तर है... साहित्य में मूल पाठ के साथ छेड़छाड़ कदापि उचित नहीं माना जाता जबकि इतिहास में निरंतर तथ्यानुशीलन और क्रमशः पाठ-नवीकरण की अपेक्षा की जाती है! विषय-विशेषज्ञों से इन दोनों पर भविष्य में कभी अवश्य विचार मांगना और कोई इतर दृष्टिकोण आये तो मुझे भी अवश्य अवगत कराना... यह मुझे बहुत अच्छा लगेगा... बल्कि मैं इसकी प्रतीक्षा करूंगा कि तुमने किसी विशेषज्ञ से विचार लिये या नहीं और यह भी कि इस पर नये क्या विचार आये! समझे ? ’’
‘‘ हां, भई हां! समझ गया! ’’ दास ने दोनों हाथ जोड़ लिये और हंसने लगे।
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‘‘ संक्रमण-काल है यह... ’’ आते ही दास ने सामने से ‘इन्दु’ का अंक उठा लिया। पन्ने पलटने लगे, ‘‘...देष की राजधानी कलकत्ता से उठकर दिल्ली आ गयी है... इधर, तुम्हारा कवि भी नाटककार और कथाकार में रूपांतरित हो रहा है... सब कुछ उलट-पलट! ’’ प्रसाद ने बैठने का संकेत किया और बहुत ध्यान से उनकी बातें सुनने लगे ‘‘...घर में सुबह देख रहा था इसी ताजे अंक को... तुम्हारी कविता ‘भारतेन्दु प्रकाश’ ने प्रभावित किया... नागरी प्रचारिणी पत्रिका में भी तुम्हारी एक रचना है- ‘कल्याणी परिणय’ नाटक! ‘‘
प्रसाद ने मुस्कुराते हुए मौन तोड़ा, ‘‘ कहीं की ईंट और कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा! ...मित्र, तुम भी कम अजीबोगरीब प्राणी नहीं हो! ’’ दास अचकचा गये। प्रसाद की वाणी में दृढ़ता। अंदाज शिकायती और कुछ-कुछ परामर्शी, ‘‘...सबसे पहले तो यही कि देष की राजधानी कलकत्ता में ही रहे या उखाड़ कर दिल्ली ले आयी जाये, इसमें भला परेशान होने की क्या जरुरत! कठोर सत्य तो यही है कि सत्ता-शासन की मूल चाभी फिलहाल लंदन में ही है... ऐसे में राजधानी चाहे जहां, जैसे या जितनी बार उजड़ती-सजती रहे, क्या फर्क पड़ता है! ...यह तो तय है कि बंग-भंग के विरुद्ध चल रहे आन्दोलन से अंगरेजों के पांव डगमगा गये हैं... वे इसी आंधी से घबराकर अब ऐसे नुस्खे आजमाने पर उतर आये हैं जिनसे उन्हें अपने उखड़ते पांवों को यथास्थान जमाये रखना सुनिश्चित बन सके...’’ दास ध्यान से देखने-सुनने लगे।
वे आगे बोलते चले गये, ‘‘ ...और दूसरी बात यह कि भिन्न-भिन्न विधाओं में मेरे लेखन-प्रयासों को तुम आखिर क्यों इतने गलत ढंग से ग्रहण कर रहे हो? एक साथ कई विधाओं में सृजन-प्रयास चलाना भला रचनाकार का विधांतरण कैसे हो गया?... उसी तरह देश की राजधानी के स्थानांतरण और मेरे रचनाकार के विधांतरण में भला क्या समानता! यह तो ठीक ऐसा ही हुआ जैसे रूप-रंग भर देखकर कोई एक झटके से कौआ और कोयल को समान घोषित का डाले! ...सोचो... ’’
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गली ज्योंही सीधी हुई ऊपर पतला, लम्बा, धारदार, दुधारी आसमान जैसे म्यान से खिंचकर लपलपा उठा। चमकता हुआ। आंखों में छप्प्-से चुभी उसकी कौंध। दूसरे ही पल सामने का दश्य देख पांव ठिठक गये। कलेजे पर जैसे चट्टान आ गिरी हो। दया की भीख मांगता हुआ एक करुण स्त्री-स्वर, रिरियाता हुआ। दूसरी समवेत आवाजें धौंस-धमकी से भरी हुई। बाजों जैसी झपट्टेदार मुद्रा-मुस्तैदी वाले तीन डरावने मुस्तंडों का चक्रव्यूह। इस कठोर घेरे में चिड़िया जैसी फंसी एक असहाय किशोरी। चाकू के बल पर तीनों उससे जोर-जबरदस्ती करने पर उतारु। तीनों की लपलपाती आंखों समेत समूचे चेहरे से जैसे दांत ही दांत झांक रहे हों। लम्बे-लम्बे, नुकीले। नोंच-भंभोर डालने को आतुर। भिंचते जबड़ों से निकलती क्रूर आवाजें। किसी गंदे नाले के काले दुर्गन्धपूर्ण कचड़े जैसी। दहशत और घृणा उगलती हुई।
एक ही झलक में जैसे पूरी बात दृश्य-पटल पर भर-उभर गयी हो। रजवन्ती की धमनियों का रक्त-प्रवाह तीव्र हो गया और तत्काल अग्नि-धार में बदल गया। आंखों से लपटें लपकने लगीं। दांत पिसने लगे। मुट्ठियां भिंच गयीं। तुरंत ही पांव पंख बन गये। कदम हवा पर सर्र-सर्र सरसराने लगे। समीप पहुंचते ही उसने दोनों केहुनियों से जोरदार धक्का मारा। जैसे किसी दीवार पर वज्र गिरा हो। घेरा तार-तार। तीनों औचक इस ‘वार’ से हक्का-बक्का।
रजवंती की वाणी अंगारों जैसी दहकने लगी, ‘‘ यह कौन बच्ची है ? कहां से इसे उठाकर लाये हो तुमलोग ? ’’
चाकू की चमक पर विद्युत-वाणी की कौंध भारी पड़ी। तीनों जैसे भीतर से दरक उठे। उनकी आंखों में स्याह डर उतर आया।
उसके शब्द दहकते रहे, ‘‘ ...छिः छिः छिः छिः! तुमलोगों को अपने आदमी होने पर शर्म करना चाहिए... मनुष्य होकर इतने गिरे हुए हो! धरती पर बोझ! मनुष्य के नाम पर कलंक! बल्कि एकदम जानवर! ...यहीं बगल में मीर घाट है... गंगा जी में उतर जाओ और डूब मरो! यदि गंगा जी तुम्हें स्वीकार लें तो अपना मोक्ष ही समझ ले लेना, वर्ना मुझे तो यही लगता है कि वे तुम तीनों को अस्वीकारकर बालू पर फेंक देंगी... सड़ने-पिल्लु पड़ने के लिए! ...काशी में सुबह-सुबह ऐसा काम! ...मैं अभी दौड़कर पुलिस बुला लाती हूं... बाबा की सौगन्ध, मैं अपनी जान देकर भी इस बच्ची को हर हाल में बचा ही लूंगी, लेकिन तुम तीनों को यहां से बचकर नहीं निकलने दूंगी... एकदम सच्ची!’’
धिक्कार का वार अचूक रहा। ‘एकदम सच्ची’ के बलाघात ने तो उनके साहस को भीतर से उखाड़कर जैसे बाहर ही ला पटका हो। तीनों भरभराकर बिखर गये। बालू की ढूह की तरह। किषोरी मुक्त होकर भूमि पर ऐसे गिरी जैसे पंजे से छूटकर काफी ऊंचाई से नीचे आ गया हो कोई पंछी। रजवंती ने झुककर गाढ़े ममत्व से उसे अंकवार में समेट लिया। तीनों के चाकुओ वाले हाथ बे-जान होकर नीचे लटक रहे थे। रजवंती के एक-एक शब्द जैसे उन्हें भीतर तक घुसकर काट-खंधार रहे हों, ‘‘ जो ईमान-धर्म की राह चलकर रोटी नहीं उगा पाते, वे नामर्द हैं! ...नामर्द यानी सड़ा हुआ मुर्दा! ...पहले भीतर का इंसान मरता है उसके बाद ईमान... इसके बाद तो शरीर चलता-फिरता मुर्दा बन जाता है और लगातार सड़ता चला जाता है... इसे कहीं भी कोई भी कुता-सियार नोंच-नोंच कर खायेगा... तुम तीनों ऐसे ही मरे हुए लोग हो! गंधाते हुए मुर्दे! भाग जाओ... यहां से भाग जाओ! ...मैं कहती हूं तुरंत भाग जाओ! ...मेरी दुःखी आत्मा से निकलते ये शब्द शायद तुम्हारे भीतर कोई प्राण-वायु फूंक सकें... ’’
एक-एक शब्द गोली की तरह उनके कलेजे को छेदते चले गये। तीनों ऐसे सटककर भागे जैसे सोंटा देखकर भुंकते हुए कुत्ते।
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रजवंती उसे लेकर छोटी पियरी आ गयी। दरवाजा खोलते ही गुलाबो ने शोर किया, ‘‘ अरे! दिदिया, यह कौन ? कितनी सुन्दर... ’’
भीतर से मीना, कुन्ती, नीलोफर, सजनी, शांता, कांति, संध्या, रेखा और शबाना समेत सबने एक साथ षोर मचाते हुए आकर दरवाजे पर भीड़ लगा दी।
श्रजवंती ने गम्भीर स्वर में सबको यहां से जल्दी हटकर भीतर चलने को कहा। सभी हो-हो करतीं भागीं। आंगन में झुण्ड बनाये खड़ी वे देर तक चुपचाप ताकती रहीं।
धूप में चटाइयां बिछी थीं। संकेत पाकर सभी बैठने लगीं। सबकी आंखों में भय-मिश्रित जिज्ञासा। किशोरी को पास बिठाकर रजवंती ने सबको घटना का पूरा विवरण बताया। लड़कियां पहले तो यह सब सुनकर दुःखी हुईं किंतु दूसरे ही क्षण सबने पास आकर उसे ऐसे समेट लिया जैसे बिछुड़ी बहनें मिल रही हों। उन्हें एक नयी सहेली मिली थी और इसे इस बे-सहारा संसार में एक अपना-सा ठिकाना।
उसके दुःख-दंशित मुखमंडल को दोनों हथेलियों से पकड़कर रजवंती ने सस्नेह उठाया। पुष्प-शब्द हवा पर टप्-टप् झरने लगे, ‘‘ बिटिया श्यामा! मेरे से लेकर यहां की एक-एककर सभी लड़की तक की कमोवेश वही कहानी है जो तुम्हारी है... सभी अपने समाज-परिवार से टूटकर बिखरते-बिखरते बची हुई मूरतें हैं किंतु अब अभागी नहीं बल्कि अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपनी तरह की दूसरी किसी भी मुसीबत की मारी लड़की की मदद के लिए तत्पर रहने वाली... उसे समेटकर साथ ले चलने की भावनाओं से सम्पन्न... हमारा व्यवसाय ऐसा कि सभी बड़े घरों में ही आना-जाना होता है और काम ऐसा कि सभी कद्र और इज्जत देने को तत्पर! ...हम गौनहारिनें हैं... भजन और गंगा-गीत से लेकर सोहर-बधइया और सभी संस्कार-गीत हमारे कंठों पर ही बसते हैं... हमारे बड़े-बड़े रईसों के घर बंधे हुए हैं, जहां हमे मंगल-मौकों पर बुलाया जाता है... ठीक वैसे ही जैसे नाइयों-धोबियों के होते हैं! बिना बुलावे के अपने मन से भी हम जहां पहुंच जायें वहां मंगल मनने लग जाता है और हमारे गीत गूंजने लगते हैं... हम हमेशा ऐसे घरों से कुछ न कुछ पाकर ही लौटती हैं... तुम्हारा मन माने तो तू भी यहीं हमारी इसी टोली में शामिल हो ले... यहां न कोई गंदगी है न कोई चालाकी! ...शेष संसार का व्यवहार तो तू झेलकर ही आ रही है ...असहाय के लिए यह संसार बहुत खूंख्वार और हिंसक है... घर के बाहर पांव निकलते ही दुनिया जैसे मगरमच्छ-मुख खोले झपट्टा मार ही देती है... ’’
श्यामा की लम्बी चुप्पी टूटी। जैसे उष्ण रोष का तीव्र स्रोत फूट पड़ा हो, ‘‘ घर के बाहर ही क्यों, मुझे तो अपने आंगन के भीतर भी इससे अलग स्थिति नहीं मिली... मैं तो अपनी जान बचाने के लिए घर से निकलकर भागी थी... वहां जायजाद और जान के भूखे भेड़िये थे, यहां आबरु के पिपासु जानवर मिल गये! आप यदि वहां कुछ मिनट भी देर से पहुंची होतीं तो सारा खेल खत्म हो चुका होता... वे मुझे बेचने के लिए दालमंडी ले जाने वाले थे... मुझे धमका रहे थे कि मैं चुपचाप चले चलूं अन्यथा वे मुझे वहीं मार डालेंगे! मैं भीतर से तो टूट रही थी किंतु अंतिम रूप में एक प्रतिरोध षुरू किया था... मुझे दूर-दूर तक यह उम्मीद नहीं थी कि मैं इस तरह बचा ली जाऊंगी...’’
‘‘ तुझे तो बचना ही था रे श्यामा! तेरा कोई कुछ कैसे बिगाड़ पाता...’’ रजवंती की आंखें भर आयीं। जल से नहीं, जलती हुई लाली से। शब्द-शब्द लाल, ‘‘ तूं श्यामा जो है! अवसर आने पर मुंडमाला पहनकर खप्परधारिणी बन जानेवाली! ...तुझे पाकर हमलोगों का यह परिवार सचमुच बड़ा हो गया रे बिटिया! ’’
सभी लड़कियां चुप। एक जैसी तरल भाव-मुद्रा। करुणा का जैसे उबाल मचल रहा हो। रजवंती ने जिज्ञासा की, ‘‘ यदि तुझसे संक्षेप में तुम्हारी कहानी पुछूं तो कुछ बताना चाहेगी ? ’’
श्यामा कुछ अधिक ही संजीदा हो गयी, ‘‘ इस जीवन की कथा तो केवल एक पंक्ति की है, किंतु इसकी कविता अनन्त है! ’’
‘‘...कविता ? ’’, गुलाबो उछलकर आगे आ गयी, ‘‘ तूं कुछ लिखती भी है क्या ? ’’
शबाना ने अपनी जगह से सवाल किया, ‘‘ तूं कुछ पढ़ी-लिखी भी है ? ’’
श्यामा बारी-बारी से दोनों की ओर ताकती रही। चुप। रजवंती ने लड़कियों को झिड़का, ‘‘ अब इसे सब मिलकर सवालों से न ढंक दो! इसे नहलाओ-खिलाओ... साथ रहने लगेगी तो धीरे-धीरे सब कुछ अपने-आप कहती-बताती रहेगी! ’’
शांता ने मुंह ऐंठा, ‘‘...और नहीं तो क्या! यह सब एक-दूसरे की कहानी ही जानने पर पड़ जाती हैं! अरे दिदिया ने तो कई बार कहा है और यही सच्चाई भी है कि नाम-गांव-दिन भर ही बदलते हैं, कहानी सबकी कमोवेश एक ही होती है, एकदम एक ही! ’’
नीलोफर का स्वर गम्भीर और दृढ़, ‘‘ पिछली कथा जानने से तो अच्छा यह कि हम अपनी अगली कहानी पर ही ध्यान गड़ायें! ’’
रजवंती हंसी, ‘‘ तुम सब अब यहीं लगे हाथ एक पूरी मीटिंग ही कर डालो!... हद करती हो! ...अरे, मैंने जो कहा इसका तो कुछ ख्याल करो! ...इसे उधर ले जाओ, भूखी -प्यासी होगी ...कुछ खिलाओ-पिलाओ भी! ’’
श्यामा ने बात काट दी, ‘‘ नहीं! अभी क्या खाना-पीना! इस तरह अपनों के साथ बैठकर बतियाये हुए एक जमाना हो चुका है... इस सुख से अधिक तृप्ति भला किस व्यंजन से सम्भव है! ’’ सबके चेहरे खिल गये। रजवंती की आंखें डबाडब हिल रही हैं। वाणी में तीखे-तप्त अनुभवों की झांस: ...मेरी कहानी तो केवल यही कि अपनों ने ही मुझे इस हाल में पहुंचा दिया है... लेकिन कविता के रूप में इसकी एक ऐसी पीड़ा मन के भीतर भर-उतर गयी है जो कभी सूखने का नाम ही नहीं लेती... यह अछोर-अथाह है और हमेशा उमड़ती-घुमड़ती रहती है! ...धन की लिप्सा कैसे मन को एक ऐसा भयावह वन बना देती है जहां हमेशा हिंसक पशुओं की दहाड़ गूंजती रहती है और उसी का खूनी शासन चलता होता है, यह मैंने अपनी आंखों देखा है... मैं इसका ऐसा शिकार बनी कि अब कुछ और न पूछो... सुनो, मेरी कहानी...
...हां, तो मैं दर्जा सात तक पढ़ी हूं। बाऊ का गंगालाभ हो गया तो स्कूल छूट गया। अम्मा ने कहा कि लड़की जात को बाहर कौन अगोरता फिरेगा! दो बिग्घे की खेती है, हम मां-बेटी ने मिलकर इसे सम्भाल लिया। मैं घर में ही लगातार पढ़ती-लिखती रहती। पहले तो मां के कहने पर उन्हें सुनाने के लिए रामायण-महाभारत को कुछ दिन उनके लिए पढ़ना पड़ा किंतु बाद में अपने मन की षांति-तृप्ति के लिए इन्हें नियमित पढ़ने लगी। इससे मेरा मन विकसित होने लगा! ....और मेरी मां तो केवल नाम-मात्र की स्त्री थीं, हिम्मती ऐसी कि तेवर में आ जायें तो बड़े से बड़ा आदमी के लिए सामने एक पल भी टिक पाना आसान नहीं! उनकी बोली-बात ऐसी कि गलत आदमी तो सामने पल भी नहीं टिक पाता! जब तक वह जीवित रहीं दोनों चाचा लोगों की कभी दम कसने की भी हिम्मत नहीं हुई। बाऊ के जाने के बाद चार साल तक मां के आंचल की छाया में जिन्दगी अच्छी बीती! वह मेरी षादी के लिए प्रयासरत तो खूब रहीं किंतु यह दैब को स्वीकार नहीं था। एक दिन देखते-देखते ओसारे में मौत उनके सामने आकर खड़ी हो गयी। काला नाग बनकर! मैंने कई-कई जगह सुना-पढ़ा था कि सांप बिना छेड़छाड़ या बगैर हमले के कभी नहीं डसते, लेकिन यह धारणा सच नहीं निकली। सर्वथा सफेद झूठ। हमदोनों मां-बेटी खटिया पर बैठी बतिया रही थीं। दिन ढल चला था किंतु अभी दिया-बाती का समय नहीं हुआ था। उजाला अच्छा-खासा था। मां के तो दोनों पैर ऊपर थे जबकि मेरा ही एक नीचे, लेकिन उसने सामने से आकर फन उछाला और मां के पांव पर डस दिया। मैं चीख पड़ी। इसके बाद वह हवा-बतास की तरह गायब। मां वहीं लुढ़कीं सो फिर कभी नहीं उठीं!...
...मैंने अपनी आंखों के सामने मां की ऐसी भयावह मौत देखी थी! कई दिनों तक पागल की तरह बड़बड़ाती रही। अर्द्ध विक्षिप्त की तरह। अब दोनों चाचा लोगों में मुझे अपने साथ रखने को लेकर खींचतान। दोनों अलग-अलग आते और बहुत प्यार से समझाते। ठीक से रखने, अच्छा-सा लड़का देखकर जल्दी से शादी करा देने के वादे पर वादे। मैंने दोनों की आंखों में साफ-साफ देख लिया था उसी काले नाग का खिला हुआ हिलता फण! एक दिन मैंने दो टूक शब्दों में उन्हें मना कर दिया। मैंने सोचा था कि अपनी खेती-बारी खुद सम्भालूंगी और वहीं पितृ-द्वार पर अकेली जीवन बिता दूंगी किंतु उनलोगों ने ऐसा नहीं होने दिया... उन्हें तो मेरी जायदाद हड़पने की जल्दी थी इसलिए मेरा रुख देखकर दोनों आपस में मिल चुके थे... दोनों ने मिलकर मेरी शादी तय हो जाने की बात बतायी और दहेज के लिए जमीन बेचने को मुझ पर दबाव बनाने लगे...
...उस रात वे सारे कागजात तैयार कराकर मेरे हस्ताक्षर के लिए ले आये... जमीन की बिक्री तो कचहरी में होती है, फिर यहां कागजात कैसे ? ऐसी जल्दी और बेचैनी भला क्यों? -मैंने जैसे ही ऐसे सवाल उठाये, छोटे वाले चाचा के सब्र का बांध टूट गया... अचानक उनकी आंखें बदल गयीं... लगा जैसे सामने हैवान की आंखें जाग उठी हों... गुफा में जलती लुकवारी की तरह... उनके मुंह से बल्बल् गंदी-गंदी गालियां फूट पड़ीं। उन्होंने झपटकर मेरे बालों को पकड़ लिया और हाथ में लपेटकर खींचने-घसीटने लगे... मैंने ज्योंही स्वयं को मुक्त कराने का प्रयास किया, वे भड़क उठे और अपनी पकड़ मजबूत बना ली। अपने भूसा वाले अंधेरे कमरे में ले गये... पीछे-पीछे बड़े चाचा भी ढिबरी और कागजात पकड़े दांत पीसते-गरियाते आ गए... दोनों की बोली-बातों से भी जैसे शराब का सड़ा हुआ भभका फूट रहा था... छोटे वाले ने एक हाथ में मेरे बाल लपेट रखे थे और दूसरे से मेरी पीठ पर धब्ब-धब्ब मुक्का पटक रहे थे... बड़े वाले ने गरियाते हुए यहां तक कह दिया कि इससे लिखवाने की आवश्यकता तो तभी तक है जब तक यह जिंदा है... इसलिए इसे मार दो तो जमीन खुद-ब-खुद हमारी हो जायेगी... हमलोग आपस में आधी-आधी बांट लेंगे... इस पर छोटे वाले ने दांत पीसकर उनकी ओर ताका और कहा- कागजात पर हस्ताक्षर करा लेने के बाद इसे मार ही तो देना है!
...मुझे अब भी नहीं विश्वास होता कि उस समय कहां से मेरे भीतर वैसी आग जैसी हिम्मत भर रही थी... मुझे बार-बार लग रहा था कि वे चाहे भले मुझे जान से मार दें किंतु मैं हस्ताक्षर नहीं करने में कामयाब बनी रह सकती हूं... आश्चर्य कि उनकी मारपीट या कोई भी धमकी-बात मेरे भीतर हताशा नहीं भर पा रही थी...’’
कथा-प्रसंग को बीच में ही रोककर चुप हो गयी श्यामा। रजवंती की आंखें जल में डूबी रहीं। लड़कियां बेसब्री से आगे की बात जानने की प्रतीक्षा करती रहीं। तनिक अंतराल पर शांता ने टोका, ‘‘ आगे क्या हुआ ? तूं कैसे बची ? ’’
श्यामा की आंखों में वह कठिन समय झिलमिल करता रहा, ‘‘...मैंने एक ही बात ऐसी कही कि दोनों को जैसे सांप सूंघ गया... उन्होंने मुझे रस्से से बांध दिया और कमरे से निकल बाहर से दरवाजा बंद कर डाला.... रात में रोते-रोते मैं वहीं बंधी-बंधी कब सो गयी, पता ही नहीं चला किंतु अहले सुबह जब पंछी बोलने लगे तो बंधे हाथों के तनाव से नींद टूट गयी... छप्पर के छेदों से उजास रिस रही थी और भीतर का अंधेरा बेमानी होने लगा था... मेरे कुछ क्षण तो यह समझने में व्यय हुए कि यह सब कोई दुःस्वप्न है या हकीकत! ...इसके बाद हाथों को थोड़ा-बहुत ऐंठने भर से लगा कि रस्सा ढीला होने लगा है और इस तरह यह खोला भी जा सकता है... इसके बाद मैंने यह प्रयास जारी रखा... अंदाजा सही निकला बन्धन खुल चुका था... इसके बाद तो भीतर से छप्पर उलटकर बाहर निकलने में कुछ ही मिनट लगे... भागती हुई गांव से निकलकर सड़क पर पहुंच ही रही थी कि एक मोटर गाड़ी आती दिख गयी... मैंने रोकने के लिए हाथ दिया... गाड़ी में एक सरदार जी थे... उन्होंने षायद बात समझ ली थी... गाड़ी रोककर मुझे बिठा लिया... मेरी कहानी सुनकर उन्होंने बहुत षराफत और इंसानियत दिखायी... मुझे बनारस लाकर गोदौलिया पर उतार दिया... वहां से मैं सीधे दषाष्वमेध घाट पर पहुंची... वहां स्नान-ध्यान करने वालों का तांता लगा हुआ था... कुछ लोग डुबकियां लगा रहे थे तो कुछ पूजा-पाठ में जुट गये थे... कुछ लोग पूजा-पात्रों में जल भरकर बाबा विष्वनाथ के मंदिर जाने के लिए घाट की सीढ़ियां चढ़ रहे थे... गंगा जी का दर्शन सचमुच मन को अनोखी शान्ति देने लगा! आसमान और गंगा जी में जैसे हाथ भर की ही दूरी हो... सूरज से झर्-झर् झर्-झर् सिन्दूर झर रहा था, झिलमिल-झिलमिल हिलती ललौंही धाराएं सुहागिन के सौभाग्यपूर्ण मानस जैसी दीप्त-संतृप्त हो रही थीं..’’
‘‘ अरे, गंगाजी के बारे में कित्ता बढ़िया बोल रही है रे! यह सुनकर कानों को कितना सुख मिल रहा है! पहली बार ऐसा अनुभव हो रहा है कि बढ़िया बातें सुनना स्वादिष्ट व्यंजन ग्रहण करने से भी अधिक आनन्ददायक होता है! इसकी जो बात समझ में तनीक भी नहीं आ रही, वह भी कानों में रस टपका रही है! ’’ सजनी ने मुग्ध भाव से कहा। सबने बहुत सम्मान से श्यामा की ओर दृष्टि डाली। वह उन सबमें सर्वाधिक हाई स्कूल तक पढ़ी-लिखी जो है!
‘‘ श्यामा, तुमने क्या कहा था, जिसे सुनकर तुम्हारे दोनों चाचा वहां से उल्टे पांव भाग गये ? ’’ शबाना की जिज्ञासा तीव्र हो उठी।
‘‘ एकदम वही जो आज सुबह उन तीनों जानवरों को रजवंती दीदी ने कही! ’’
रजवंती ने चौंककर देखा। सभी उन दोनों को बारी-बारी से ताकने लगीं। श्यामा ने अपनी बात आगे बढ़ायी, ‘‘ वही तो मैं सुबह से सोच रही हूं कि ऐसा कैसे हुआ! मैंने जो कुछ बोलकर चाचाओं को पस्त किया था, एकदम वही-वही बातें दीदी के मुंह से कैसे निकल गयीं! एकदम वही!! ’’
रजवंती ने आंखें गड़ाकर होंठ बिचकाये, ‘‘ अच्छा! तुमने भी अपने दोनों चाचों को नामर्द और मुर्दा कहा था ? इसी पर दोनों वहां से भाग गये ?... ’’
श्यामा का चेहरा सख्त हो उठा, ‘‘ ...और नहीं तो क्या! ऐसे लोग नामर्द और मुर्दा ही तो हैं, जो मिहनत से धन कमाने की ताकत नहीं रखते परंतु इसके लिए औरत तक पर हाथ उठाने से भी नहीं चूकते! ’’
शांता हंसी, ‘‘ मर्द खुद को नामर्द कहे जाने पर सबसे अधिक घायल होता है न!  इसीलिए... ’’
सजनी ने समझाया, ‘‘ नामर्द कहे जाने भर से नहीं, नामर्दी का पर्दाफाश हो जाने से टूट जाता है पुरुष दम्भ! यही तो है खोखली बहादुरी का मनोविज्ञान! ’’
कुछ देर सभी चुप रहीं। रजवंती ने अपनापन के साथ समझाया, ‘‘ न कोई जल्दी है न जोर-जबरदस्ती... तेरा मन माने और यह काम पसन्द आ रहा हो तो तूं हमारे गोल की सदस्या बनकर हमेशा-हमेशा के लिए हमारी संगी बन सकती है... नहीं तो जब जो चाहे निर्णय ले सकती हो!... ’’ श्यामा ने गौर से ताका, फिर सिर को नीचे कर लिया। वह अपनी बात कहती चली गयी, ‘‘ पहले तो तूं यहां जब तक चाहे इत्मीनान से रह... यहां न कोई चिन्ता है न डर! तुम्हारे चाचाओं को यदि पता भी चल जाये तो यहां दरवाजे पर चढ़ने की उनकी हिम्मत नहीं होगी... क्योंकि अव्वल तो वे इस गली में घुस नहीं सकते और यदि गलती से पहुंच गये तो फिर यहां से सकुशल लौट तो सकते ही नहीं!... हमारे कद्रदां एक से एक रईस हैं... बड़े-बड़े लठैत और लड़ाके पालने वाले... हमारे एक इशारे पर वे घंटों-मिनटों में कितने-कितनों को जमीन पर गिरवा सकते हैं!...  हम चाहें तो तेरे गांव में लठैत भेज दरवाजे पर चढ़कर तेरे चाचाओं की हड्डी-पसली तोड़वा दें... लेकिन हम अपने मन से ऐसा नही करेंगे... तूं चाहे तभी! .’’
श्यामा मुस्कुरायी, ‘‘...अभी यह सब छोड़िये! जानबूझकर जानवरों से क्या भिड़ना! मेरे चाचाओं के सिर पर खून सवार है और लालच का भूत भी... मैं जब वहां से उनकी कैद तोड़ निकल गयी तो निकल गयी! अब आपलोगों को देखकर मुझे यह लगने लगा है कि इस जीवन को अब भी सुन्दर ढंग से संजाया व जिया जा सकता है! इसलिए अब मैं उस पूरे मामले से अपना दिमाग बाहर निकाल लेना चाहती हूं! ’’
रजवंती ने सहमति में सिर हिलाया। वह आगे बोलती चली गयी, ‘‘ सुबह गली में मैं जिस तरह के संकट में फंस गयी थी, क्या इससे बड़ी विडम्बना भी कोई दूसरी हो सकती थी! लेकिन आपने दरिंदों के खैफनाक पंजे मरोड़कर मुझे मुक्त करा लिया! इसके बाद भी अब मुझे भला किस सुरक्षा-आश्वासन की आवश्यकता हो सकती है! मैं यह समझ सकती हूं कि आपके साथ रहना अपनी मां के आंचल के साये में रहने से जरा भी कम नहीं होगा! सच मानिये, प्रकृति का कभी न बदलने वाला विधान भी मेरे लिए एकदम उलट गया है... जहां जाकर कभी कोई नहीं लौटता, मेरी मां तो उस स्वर्ग से भी वापस आ गयी है...’’ श्यामा बोलते-बोलते फफक पड़ी और कातर भाव से रजवंती की ओर ताकती रही। वह भी उमड़ पड़ी और उसे किसी नन्ही बच्ची की तरह समेट लिया। रजवंती के कंधे पर दबे मुंह से भींगे शब्द फूटते रहे, ‘‘ ...आपका बचाया हुआ यह मेरा जीवन अब आपको ही समर्पित कर देना चाहूंगी! सबसे बड़ी बात तो यह कि आपने बेसहारों को सहारा देने का यह काम पवित्र अभियान के तौर पर चला रखा है... मुझे भी इसमें आगे योगदान देने का मौका मिल सकता है... खुद की तरह दूसरी किसी एक बेसहारा लड़की का जीवन भी यदि भविश्य में बचा सकी तो इससे बड़ी उपलब्धि भला दूसरी क्या होगी! मैं अब इसी परिवार की सदस्या हूं और आगे भी रहना चाहूंगी! ’’
 लड़कियों के चेहरों पर मुस्कान तैरने लगी। रजवंती स्नेहाविश्ट हो उठी। श्यामा का मुख कंधे से उतार सामने किया और उसके दोनों हाथ पकड़ लिए, ‘‘ अब भूलकर भी कभी यह न समझना कि इस दुनिया में तूं अकेली है... आज से यह बड़ा-सा परिवार तेरा अपना परिवार है!’’
‘‘...और सबसे बड़ी बात तो यह कि मुझे आप जैसी एक ऐसी शख्सियत मिल गयी जिसमें कभी बड़ी बहन की छवि दिखती है तो कभी मां की!’’ श्यामा के शब्द भीग गये हैं।
रजवंती ने उसके सिर पर हाथ रख दिये हैं।
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बीच वाला बड़ा कमरा। दरी बिछी है। सभी जमी हैं। बड़ा-सा गोल घेरा बनाकर। रजवंती ने हारमोनियम सम्भाल रखी है। श्यामा बीच में खड़ी हो गयी। समीज के ऊपर-ऊपर बायें कंधे से आगे-पीछे तिरछे समानांतर नीचे उतरकर दायीं ओर कमर तक आया हुआ और फिर दो लपेटे में कमरधनी की तरह बंधा लाल दुपट्टा। चेहरे पर चहक। आंखों में कला की कौंध और आलाप की दृष्य अनुगूंज। लड़कियां आपस में खुसुर- पुसुर से बाज नहीं आ रही थीं। शांता ने नीलोफर के कान में फूंक मारी, ‘‘ अरे... अरे! ...देखो रे! ष्यामा को देखो! कैसी जन्मजात गौनहारिन लग रही है! ’’
थोड़ा अलग बैठी मुस्कुरा रही है कांति। बात कानों में पड़ते ही उसने भौंहें उचका दी, ‘‘ उसकी आंखें देखो... देखो-देखो, भौंहें और बाहों का अंदाज! ...और देह कैसी लचीली है, एकदम लत्तर जैसी! ’’
कुन्ती ने होंठ गोल किये, ‘‘ यह तो आसानी से किसी भी मोटे रर्इ्रस का शिकार कर सकती है! ’’
‘‘ तो इसमें क्या बुराई है! दिदिया तो कहती ही है कि जिसे भी सही जीवन-साथी मिल जाये बता दे... विवाह करा दिया जायेगा! ’’ शबाना ने सहज परिणति दी।
अक्सर चुप रहने वाली संध्या ने भी मुंह खोल दिया, ‘‘ मानना होगा, इसके मुंह का पानी बहुत बढ़िया है... नैन-नक्श गजब तीखे... ’’
रजवंती की त्योरी चढ़ गयी, ‘‘ बगैर डांट के तुम सब का मुंह नहीं बंद होगा? ’’
अचानक सभी चुप। श्यामा खड़ी-खड़ी मुस्कुरायी। जवाब में सभी लड़कियां भी, लेकिन मौन अखण्ड। हवा पर जैसे मुस्कान ही मुस्कान बिछलती हुई तैरने लगी।
रजवंती ने आंखें मूंद ली। सिर आलाप के अंदाज में हिलने लगा। नीचे हारमोनियम पर दोनों हाथ सक्रिय हो उठे। श्यामा ने गति के साथ घूमकर हाथ हवा में लहराये और एक वृत्त-सा बना लिया। अब वह मीठे-मीठे थिरकने लगी-
      
       ठुमुक चलत रामचन्द्र बाजति पैजनियां...
       ठुमुक चलत रामचन्द्र...
हारमोनियम से निकलती ध्वनियां हवा पर बिछने लगीं। खिले-खिले लाल-पीले फूलों के गुलगुले गलीचे की तरह। जैसे कोई टहक कालीन धरती से आसमान की ओर खुलती व फैलती-पसरती चली जा रही हो! ...और इसी रंग-तरंग के विस्तार पर मोहक चाल में चलने-टहलने लगे ष्यामा के मृदुल-मसृण राग!
रजवंती ने झूमते हुए एक हाथ हारमोनियम पर से उठाया और हवा में लहराने लगी। दाद देने के अंदाज में ‘‘ वाह! बहुत खूब!! ...अद्भुत! ...श्यामा, तेरे कंठ में तो कोई कोयलिया छिपी हुई है रे! ...ऐसी आवाज तो भगवान का प्रत्यक्ष प्रसाद है! ’’
श्यामा की नव्यतर नृत्य-भंगिमाएं, रस-वर्षक रागान्वितियां यानी सम्पूर्ण सजीव प्रस्तुति ऐसी प्रभावोत्पादक बन-बनकर दृश्यांतरित होने लगी कि सभी मंत्रमुग्ध। अनोखापन यह कि शब्द सतत् दृश्यों में, दृश्य निरंतर स्वरों में और स्वर अनवरत अनुभूतियों में रूपांतरित होते चले जा रहे हैं। आनन्द-सुधा की झमाझम वर्षा से आत्मा की पूरी वसुन्धरा आप्यायित! कंठ ही नहीं, भाव-मुद्राएं भी आलाप रही हैं दृष्यमान लयबद्ध राग। लहराते हाथ, थिरकते पांव एवं क्षण-क्षण दरी को छू रहे चमकते तलवे के काव्यमय नर्त्तन से पैजनिया के बजने की सजीव-दश्यमान अभिव्यक्ति। भाव-मुद्राएं बहुविध और बहुरंगी। कभी पलकें झपकाते हुए गालों को गोल बनाकर बालक-रूप की अनुकृति तो कभी विशेष अंदाज में छोटे-छोटे कदमों से ‘ठुमुक-ठुमुक’ चलने का उपक्रम-अभिनय। कभी दक्षता से भरे अभिनय के साथ ‘रामचन्द्र’ के भगवान होने का लक्ष्य-संकेत तो कभी मुग्धता के भाव-निरुपण से भगवान के मनुष्य रूप में अवतरित होने की घटना की विशिष्टता की अभिव्यक्ति।
रजवंती ने हारमोनियम बजाते हुए मुंह को कुछ यों बनाया जिससे सुखद आश्चर्य की सुखकर झलक व्यक्त हुई। सभी लड़कियां हतप्रभ अपलक ताकती रहीं।
नृत्य-गायन और वादन को तो विराम मिला, किंतु हवा पर अब भी थिरकन। मीना, शांता, रेखा और शबाना लगभग एक साथ चहकती हुई उठ खड़ी हुईं। सभी श्यामा को शाबाशी देने लगीं। वह संकोच से सिमट-सी गयी। सबने उसे पकड़कर दरी पर बिठा लिया। रजवंती पास आ गयी, ‘‘ श्यामा, तेरा कंठ तो कमाल है रे! ’’
‘‘...और नृत्य भी तो! ’’ रेखा अधूरी प्रशंसा से जैसे बेचैन हो उठी हो।
‘‘ हां... हां! सब अच्छा ही अच्छा! कितना अच्छा नृत्य किया तूने! लजवाब! ’’ रजवंती पीठ ठोंकने लगी। शब्द-शब्द तृप्त-संतृप्त, ‘‘ अब सारा काम मेरा ही मेरा है...! तुम्हें ठुमरी, ठप्पा, कजरी और चैती सिखलाने का काम मुझे जल्दी पूरा करना होगा!... मुझे पूरा विश्वास है कि तुम यह सब जल्दी ही जल्दी सीख जायेगी... ’’
‘‘ सीखना क्या है, इसे तो केवल एक बार जानकारी भर चाहिए! यह तुरंत सब कुछ ठीक-ठाक ढंग से उतार लेगी! ’’ शबाना ने उसके हाथ पकड़ रखे थे, ‘‘...जिसके पास ऐसा सतरंगा कंठ हो और रागों की बारीक व्यवहारी समझ, उसे ठुमरी से लेकर चैती तक किसी गवनई में कोई दिक्कत नहीं हो सकती! इसलिए... ’’
रजवंती मुस्कुरायी, ‘‘ हां वो तो है... लेकिन गीत-संगीत या कला के किसी भी क्षेत्र में जानकारी काफी नहीं होती... लगातार रियाज जरूरी होता है... गायन-वादन हो अथवा नृत्य, सभी विधाओं में रोजाना रियाज होना चाहिए... ’’

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About Shyam Bihari Shyamal

Chief Sub-Editor at Dainik Jagaran, Poet, the writer of Agnipurush and Dhapel.
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3 comments:

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  2. एसएमएस मिला.... बेहतरीन जानकारी के लिए आभार संवाद कायम रहे ...

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  3. कंथा का अंश पढने के बाद कह सकता हूँ कि यह अच्छी शुरुआत है। कुछ भाषा और काल सम्बन्धी संतुलन और बिठाना पडेगा। श्यामा का चरित्र अच्छा उभर रहा है। आगे प्रसाद का भी उभरेगा ..कुल मिलाकर अच्छी शुरुआत लगती है।

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