श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल - 140

शिकंजा कसने की किसमें भला हिम्मत थी    श्याम बिहारी श्यामल   सबको कुबूल यहां पोशीदा हक़ीक़त थी छुपने-छुपाने की अब कहां ज...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल- 139

शरारा ने कहा ज़िंदा रहेंगे हम श्याम बिहारी श्यामल पूरा कुनबा उसी से परेशान था     क्योंकि उसके पास अब भी ईमान था आग ...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल- 133

तब तारीख संवरती है श्याम बिहारी श्यामल   दायरा टूटे बगैर बात कहां बनती है   कहां घड़ी की सुई कभी कहीं पहुंचती हैं  रोज़...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल- 132

शोलों को जिलाता श्याम बिहारी श्यामल   बादल में आग है उससे बात कर फ़ुर्सत में श्यामल से मुलाक़ात कर क्या कहाँ कैसे क...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल - 131

सच यही यह बस  श्याम बिहारी श्यामल  जिसे लगती हो लगे यह ग़ज़ल    हमारी  यह तो ज़िंदगी असल   अलामात अल्फाज़ मंज़र  सब      ...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल- 125

सीधी-सी लकीर  श्याम बिहारी श्यामल  चुप्पी गहरे उतर कर  बजती है   सबसे अधिक खामोशी कहती है    गुजरता जाता है मंज़...
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