ज़मीन को तरस रहे गुंबद

मंज़र कौन आधे और कौन समूचे श्याम बिहारी श्यामल   नक्स-ए-हालात वक़्त ने ग़ज़ब खींचे हैं ऊंट सब ऊपर हैं और पहाड़ नीचे हैं ज़माने...
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संग-ए-राह भूलें न हमें दिली अर्ज़ है

मुखड़ा अनजाना सामने किसका श्याम बिहारी श्यामल   सबक-ए-घाटा तो फायदे में दर्ज़ है शुक्र-ए-अदायगी अब हमारा फ़र्ज़ है  क़दम-क़दम ...
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दुश्वारियों से बेखबर हर फूल खिला था

क़ातिलों को भी पसंद था मसलना उन्हें  श्याम बिहारी श्यामल  कहीं लाल हरा तो कहीं नीला पीला था  कौन-सा रंग डालों पर  जो  नहीं खि...
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हौसला भी मुक़म्मल मक़बूल का घोड़ा

ताक़तवर शख्स कभी हक़ में न रहा  श्याम बिहारी श्यामल  दुश्वारियों ने कई बार हद को तोड़ा है  शुक्र है उम्मीदों ने साथ नहीं छोड़ा ह...
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छत से टपकती माई-बाबूजी की आहट

ताकतीं दीवारें स्नेह-ममत्व से भर कर श्याम बिहारी श्यामल   बेशक़ ईंट-पत्थरों का ही हमारा भी घर पर फिक्रमंद रहता बहुत आजकल अक्स...
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बाज़ार कुंजड़ों से घिरा था

इत्तिफाक यह या साज़िश कोई श्याम बिहारी श्यामल  यहां-वहां खीरा ही खीरा था कौन पहचानता वह हीरा था इत्तिफाक यह या साज़िश कोई ...
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