मंगलेश : यह हौसलाआफजाई है या उलटबांसी

कवि मंगलेश डबराल ( फाइल चित्र : साभार गूगल ) 

 हमारी पीढ़ी को कविता को कविता बनाने की फिक्र रहती थी.इस मानी में कि कविता कवि से छूट कर अपनी आज़ाद हैसियत हासिल कर ले. आज की पीढ़ी इस चिंता से मुक्त है . कहेंगे , जो कहना है . कविता बने तो , न बने तो. इस बेफिक्री ने कविता की जनतांत्रिकता में इजाफा किया है. रसोई में सब्जी छौंकती स्त्री भी अपने मन की कह देती है तो एक कविता हो जाती है . वह कविता महान न हो , लेकिन कविता के इलाके का विस्तार तो करती है.
      
मंगलेश डबराल 
      ( फेसबुक पर आशुतोष कुमार द्वारा रेखाकित टिप्‍पणी )

 कविता में जनतांत्रिकता के इजाफे का खुशनुमा दर्शन   

अपना मोर्चा   श्‍याम बिहारी श्‍यामल

         विता में एक तरफ जहां आकाश-पाताल एक कर देने वाला झलकुट्टन जारी है वहीं इसके बरक्‍स पाठक उपलब्‍ध न हो पाने का विकट विलाप भी। पत्र-पत्रिकाओं या वेब पर जो विधा सर्वाधिक फूल-फल रही है, वह यही है। जहां तक प्रकाशन की बात है, आज बड़े से बड़े कवि की किताब प्रकाशक निश्‍शंक होकर छापने की स्थिति में नहीं दिखता। कारण है कविता-किताबों की बिक्री न होने की शिकायत। प्रकाशक छूटते ही कहते हैं कि कविता-किताबें बहुत कम  बिकती हैं। कारण कई हो सकते हैं।   
         दूसरी तरफ उपन्‍यास के लिए कोई भी प्रकाशक हमेशा उत्‍सुक रहता है। लेखक से प्राप्‍त करने को नाना विधि से प्रयासरत भी। उसका यह तर्क है उपन्‍यास को पाठक उठाता और खरीदता है। कहना न होगा कि उपन्‍यास को आम पाठक मिलने की वजह है इसकी आम सम्‍प्रेषणीयता और ग्राह्यता। इसी के समानांतर सर्वथा विपरीत हालात हैं कविता की। कविता का एक हिस्‍सा जहां दुरुहता का शिकार होकर सर्वथा असहज और अग्राह्य माना जा चुका है वहीं दूसरा बड़ा हिस्‍सा अपेक्षित सर्जनात्‍मक मेधा-सतर्कता के अभाव का शिकार बन बकवास का पर्याय होकर रह गया है। ऐसे में कोई भला कविता-कि‍ताब क्‍यों खरीदे। खरीद भी ले तो करे क्‍या। 
        विवार ( 04 दिसंबर ) को दिल्‍ली में ' कवि के साथ ' श्रृं,खला ( साथ में लीना मेल्‍होत्रा का काव्‍य-पाठ ) के आयोजन में चर्चित कवि मंगलेश डबराल  ने हिन्‍दी में असावधानी से लिखी जा रही कविताओं पर टिप्‍पणी की है। अव्‍वल तो इतने गंभीर मसले पर यह बहुत ही अस्‍पष्‍ट और कामचलाऊ वक्‍तव्‍य है, दूसरे, पूरी तरह विरोधाभासी भी। उनके शब्‍द देखि‍ये, ''...हमारी पीढ़ी को कविता को कविता बनाने की फिक्र रहती थी.इस मानी में कि कविता कवि से छूट कर अपनी आज़ाद हैसियत हासिल कर ले...  '' कवि का यह प्रयास कि रचना अपने रचनाकार से छूटकर अपना स्‍वतंत्र अस्तित्‍व प्राप्‍त कर ले, निश्‍चय ही आदर्श लेखन-प्रक्रिया का ही बोधक है। कृति की बल्कि यही ठोस कसौटी भी है कि वह स्‍वयं में किस हद तक एक पूर्ण और मौलिक इकाई बन सकी है। इस लिहाज से मंगलेश अपनी पीढ़ी के जिस प्रयास का जिक्र कर रहे हैं, वह स्‍तुत्‍य ही लग रहा है। 
         ब इसी वक्‍तव्‍य के अगले अंश को देखें, '' आज की पीढ़ी इस चिंता से मुक्त है . कहेंगे , जो कहना है कविता बने तो न बने तो,. इस बेफिक्री ने कविता की जनतांत्रिकता में इजाफा किया है. रसोई में सब्जी छौंकती स्त्री भी अपने मन की कह देती है तो एक कविता हो जाती है . वह कविता महान न हो , लेकिन कविता के इलाके का विस्तार तो करती है. '' बातें जितनी उलझी हुई, भ्रामक उससे कम नहीं। कविता का इलाका बढ़ना क्‍या होता है भीड़ बढ़ने से क्‍या साहित्‍य की गुणवत्‍ता उन्‍नत हो जायेगी ?
         मंगलेश आज के रचनाकार के जिस ' कविता बने तो न बने तो...' जैसी प्रवृति का जिक्र कर रहे हैं, जिसके तहत वह कुछ भी लिखकर उड़ा दे रहा है, यह 'बेफिक्री' है या चिंताजनक लापरवाही ? क्‍या रचना-कर्म सचमुच ऐसा ही कोई मनमाना टपोरी उपक्रम है ? अगर ' हां ' तब तो आगे कुछ भी कहना बेकार है। उस पर तुर्रा यह कि‍ इस 'बेफिक्री' ने कविता की जनतांत्रिकता में इजाफा किया है... सृजन के किसी भी क्षेत्र में जनतंत्र या राजतंत्र अथवा प्रशासन तंत्र क्‍या होता है ? क्‍या कविता में चुनाव आयोग, सीबीआई, या जनलोकपाल,आदि भी बन चुके हैं ? 
         समें दो राय नहीं कि जनतंत्र एक सार्थक और गंभीर शब्‍द है, इसे जहां-तहां ठोंककर इसे क्षतिग्रस्‍त ही किया जायेगा। कविता लिखने में भला जनतंत्र शब्द  की क्‍या संगति ? कल कोई नाश्‍ता करने या दूसरी नित्‍य क्रियाओं में लोकतंत्र के मूल्‍य जोड़ने या खोजने  लग जाये, तो उसे क्‍या कहेंगे ? कहना न होगा क‍ि साहित्‍य के शास्‍त्रीय संदर्भों में राजनीतिक शब्‍दावली डालने और घोल-मट्ठा करने की यह प्रवृति लोकप्रियता लूटने के सस्‍ते नुस्‍खे का ही नमूना है। इसके विपरीत यदि उनकी ट‍िप्‍पणी व्‍यंग्‍य में हो ( अर्थात उलटबांसी जैसा कुछ ) और विपरीत अर्थ देकर नयों का मजाक उड़ा रही हो, तब,तो यह और अधिक दुखदायी व्‍यवहार कहा जायेगा।
         ह घोर चिन्‍ताजनक है कि मंगलेश जैसे लोग भी अब अपना समर्थन-बल बढ़ाने के लिए जनपसंदगी की नब्‍ज टटोलने और जनसुखकारी कुछ भी कह देने की राह चल पड़े हैं। किसी भी तालीपसंद मंचीय आचार्य की तरह जो ' जब जहां जैसा तब वहां वैसा ' बोलकर काम चला लेता हो। सवाल है कि कविता ( या किसी भी अन्‍य विधा ) में जिस भीड़ बढ़ने को वह जनतांत्रिकता का विकास बता रहे हैं, इसका आखिर साहित्‍य को क्‍या लाभ ? कुछ भी लि‍ख डालने के जुनून में लिखी रचनाएं यदि पाठकों को निराश और विकर्षित ही करती चलें, तो बचे-खुचे पाठक-आधार को भी ढहा देने वाला यह कार्य लाभप्रद सहभाग है या विनष्‍टकारी घातक हमला ?
         स दृष्टि से सोचने पर तो यही लगता है कि नयों को वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध बनाने या सर्जनात्‍मक  संजीदगी का पाठ पढ़ाने के मुकाबले मंगलेश्‍ा ने उनकी कमियों को भी विशेषता बताकर बहकाने-बरगलाने जैसा ही उपक्रम किया है। प्रतिशत-दर में यह चाहे जितना कम असरकारी ठहर रहा हो, किंतु सोलह आना सच तो यही कि साहित्‍य को हम सामाजिक बदलाव का हथियार ही मानते आये हैं। लेखन से हम नया समाज गढ़ने का मंसूबा रखते हैं। यहां जितनी जरूरत मेधा की आंकी गई है, उससे कहीं अधि‍क सामाजिक प्रतिबद्धता और वृहतर मानवीय सरोकार जैसे मूल्‍यों की। नये समाज के लिए जनमानस के रचाव या इसके लिए उसमें सकारात्‍मक भाव-प्रवेश का कार्य प्रभावोत्‍पादक रचनाओं के माध्‍यम से ही संभव है। निश्‍चय ही यह दायित्‍व-भार वहन अस्‍त-व्‍यस्‍त रचनाएं नहीं कर सकतीं। दूसरी तरफ सार्थक और प्रभावशाली रचनाएं ही नये पाठक बना अथवा पुराने को जोड़े रख सकती हैं अन्‍यथा अंट-शंट चीजें मोहभंग और अविश्‍वास पैदा करती हैं। इनसे विकर्षण पैदा होना लाजिमी है, जो साहित्‍य की बुनियाद को खंधार कर रख देने वाला है।
         मंगलेश जी जैसे लोगों की बातो को गंभीरता से लिया जाता है अत: उन्‍हें साहित्‍य ( या कविता अथवा रचना ) के बारे में नयों को उपयोगी मार्गदर्शन करना चाहिए... 

  • कवि मंगलेश डबराल ( फाइल चित्र : साभार गूगल ) 



  • फेसबुक पर 07 दिसम्‍बर 2011 को चला विमर्श  



  • मंगलेशजी ने अहम बात यह कही कि हमारी पीढ़ी को कविता को कविता बनाने की फिक्र रहती थी.इस मानी में कि कविता कवि से छूट कर अपनी आज़ाद हैसियत हासिल कर ले. आज की पीढ़ी इस चिंता से मुक्त है . कहेंगे , जो कहना है . कविता बने तो , न बने तो. इस बेफिक्री ने कविता की जनतांत्रिकता में इजाफा किया है. रसोई में सब्जी छौंकती स्त्री भी अपने मन की का देती है तो एक कविता हो जाती है . वह कविता महान न हो , लेकिन कविता के इलाके का विस्तार तो करती है. लेकिन अशोक भौमिक को लगता है कि ऐसी बे -परवाई से कविता के कवितापन को गंभीर खतरा है . बेफाल्तू की , उबाऊ , जरूरत से ज़्यादा लंबी और अस्मिताहीन कविताओं की भीड़ के चलते हिंदी में कड़ी मेहनत से कमाई गयी उत्कृष्ट कविता का वजूद ही संकट में पड़ गया है . युवा कवियों ,आप क्या कहते हो .

    • Prafulla Kolkhyan 
      निवेदन है कि मंगलेश डबराल यह बात कहते नहीं हैं, बल्कि इस बता से सहमत होते हैं शायद कि कविता की जनतांत्रिकता' में इजाफा होना कविता की अंतर्वस्तु में छीजन का करण है। असल में जैसा कि आशुतोष जी ने कहा है, पहले के कवि अपनी कविता पर कड़ी मिहनत करते थे, अाज के कवि नहीं करते हैं, यह कुछ हद तक सही है। उस अर्थ में मिहनत से कविता नहीं बनती। मुझे लगता है कि आज के कवि रीझाने के चक्कर में नहीं पड़ते हैं। कविता लिखने के बाद आज कोई कवि नहीं होता बल्कि कवि होने के बाद कविता लिखता है। कविता में जनतांत्रिकता में इजाफा का आशय यह है कि कविता लिखने के लिए किसी तैयारी की जरूरत कवि के मन में नहीं होती है। वह लिखनेवाले के लिए भी अधिकतर मामलों में आत्मीय नहीं होती है, जबकि कविता होने के लिए उसे अपने पाठकों का भी आत्मीय होना होता है। अधिकतर कवि उसी तरह कविता लिखते हैं जिस तरह हमारे समय में अधिकतर लोग मताधिकार का प्रयोग करते हैं, तातत्कालिकता से आगे बढ़कर नहीं सोचते, कोई दीर्धकालिक आत्मीयता कहलें प्रतिबद्धता, आगे की दुनिया की कल्पना (सपना) नहीं होती है। निष्क्रिय (पैसिव) लेखन पाठकों के मन में सक्रिय अभिप्रेरणा नहीं बन पाता है। वैसे आज भी अच्छी कविता लिखी जाती है यह अलग बात है कि कई बार, कई कारणों से, उसे कविता की भीड़ से निकालकर हम देख नहीं पाते हैं।बहरहाल, निवेदन यह कि एक गंभीर मसला है, फेस बुक पर अभी तो इतना कहना जरूरी लगा।


      • Rajiv Chaturvedi 
        श्यामल जी , कविता पर आपने एक बहुत ही सार्थक बहस छेड़ी है. यह भी सच है कि जिसे प्रगतिशील कविता कहा जाता है उसके नाम पर कवियों की प्रगति और हिंदी कविता की दुर्गति हुई है. दिनकर जैसे क्रांतिकारी कवियों को हासीये पर फेंक कर छाद्म्क्रन्तिकारी कवियों को क्या मिला ?
        " शब्द- जलेबी को कविता जो समझे बैठे,
        उनसे मेरा आग्रह है आशय समझाओ.
        फूल कली मकरंदों की अब बात न करना,
        शब्दों की सम्प्रेषणता कितनी यह बतलाओ." --- राजीव चतुर्वेदी ....!!!



        • Hitendra Patel dono tarah ki kavitayein aayeengi aur aani chahhiye.


        • Ishan Awasthi क्‍या हुआ... इतनी अच्‍छी बात पर भी भाग गए बुद्धिजीवी.... कोई नहीं आया.....हा हा हा.....।।।


        • Ashok Kumar Pandey फिर औरतों को रसोई और सर्वहारा को हाडतोड श्रम से मुक्ति दिलाइये...फिर देखिये 'जैसे-तैसे' लिखने वाले क्या कमाल करते हैं..


          • सुनील श्रीवास्तव हम फेसलेस कविता के समय से गुज़र रहे हैं ... उदारीकरण और भूमंडलीकरण के व्यापक प्रभाव के अंतर्गत बने अवसरों और विकल्पों के बीच अब बहुत सारे लोग अपनी उद्दाम अनुभूतियों को एक नेट्वर्क के अंदर बाँटना चाहते हैं... शिल्प और बिम्ब से बेखबर... लेकिन अच्छा है, इस भीड में सच्ची कविता भी छन-छन कर आ रही है, चाहे रसोईंघर से चाहे खलिहान या डिपार्टमेंटल स्टोर से ही क्यूँ न हो ... कविता की आत्मा उसके बिम्ब में है और वह बची रहेगी...




            • Satyendra Pratap Singh आप भी महराज कहाँ लगे हैं. कौन पढता है कविता फविता. जो लोग जन सरोकारों से जुड़े हैं और कुछ लिख देते हैं, उन्हें पढ़ा जाता है, अन्यथा बकिया का सरकारीकरण हो गया है और वो पचीस-पचास हजार का हाल बुक कराकर कविता का पाठ करें, सुनने वाले के नाश्ता/खाना का प्रबंध करें, तभी कविता सुनी जाती है:)



            • Neel Kamal  
              बुज़ुर्गों की एक
              आदत है कि वे अपने दौर के प्रति एक प्रकार से ऑब्सेस्ड होते हैं । जैसे कि वे कहेंगे हमारे ज़माने में तो दूध पचास पैसे किलो था , फ़लाने पहलवान का तो कोई जोड़ ही नहीं था , आज क्या ज़माना आ गया है । उन्हें कहने दीजिए । मेरा एक आग्रह 
              है - जो कविता की सारी बीमारियाँ जानने का दावा करते हैं वे समस्त बीमारियों से मुक्त एक कविता लिख कर क्यों नहीं दिखाते । माना कि गावस्कर अच्छा क्रिकेट खेलते थे लेकिन भैया अपने धोनी , युवराज , सहवाग ये भी कोई ऐरे गैरे नहीं हैं ..
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About Shyam Bihari Shyamal

Chief Sub-Editor at Dainik Jagaran, Poet, the writer of Agnipurush and Dhapel.
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8 comments:

  1. जिस प्रकार कोई कक्षा प्रथम में पढता है तो कोई Ph.D. कर रहा है. दोनों की यात्रा जारी है.
    जैसे हजारों फ़िल्में बनती है ,कुछ दुबारा देखी जाती है ,कुछ बार-बार देखी जाती हैं,
    वैसे ही कविता सृजन करने को देखें
    पहली कविता लिखनेवाले से 'रामायण'की अपेक्षा करना उचित नहीं
    पर लिखते लिखते वो लिखा भी जा सकता है
    वास्तव में तो लिखते लिखते जब कवि ईश्वर एवं कलम के मध्य से स्वयं को हटा देता है तो ही वास्तविक कविता प्रकट होती है
    पर जब तक ये न हो पाए -प्रयास हमेशा चलना अच्छा है ,रुकना नहीं
    'मंजिल मिले न मिले , इसका गम नहीं,
    मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है'

    कोई गुस्ताखी हो गयी हो तो क्षमा करें

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  2. जिस प्रकार कोई कक्षा प्रथम में पढता है तो कोई Ph.D. कर रहा है. दोनों की यात्रा जारी है.
    जैसे हजारों फ़िल्में बनती है ,कुछ दुबारा देखी जाती है ,कुछ बार-बार देखी जाती हैं,
    वैसे ही कविता सृजन करने को देखें
    पहली कविता लिखनेवाले से 'रामायण'की अपेक्षा करना उचित नहीं
    पर लिखते लिखते वो लिखा भी जा सकता है
    वास्तव में तो लिखते लिखते जब कवि ईश्वर एवं कलम के मध्य से स्वयं को हटा देता है तो ही वास्तविक कविता प्रकट होती है
    पर जब तक ये न हो पाए -प्रयास हमेशा चलना अच्छा है ,रुकना नहीं
    'मंजिल मिले न मिले , इसका गम नहीं,
    मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है'

    कोई गुस्ताखी हो गयी हो तो क्षमा करें

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  3. आपका आलेख प्रशंसनीय है ...बधाई श्यामल जी... एक समय था जब ये कहा जा रहा था कविता लिखी ही नहीं जा रही, पाठक भी नहीं हैं आज कहीं कुछ तो बदला है फिर ..... इस तरह के प्रश्न भ्रामक स्थिति उत्पन्न करते हैं.... हर समय की सोच अलग होती है क्यूंकि परस्थितियाँ मनुष्य को गढती हैं फिर साहित्य भी अलग ही होगा..... क्यूँ नहीं अभिनंदन किया जाना चाहिए..... "सार सार को गहि लए थोथा देयी उडाय'...

    स्त्री का चौके-चूल्हे से बाहर आकर लेखनी पकड़ लेना क्या अपने आप में अपने से जूझना और परिस्थितियों से जूझने का संघर्ष क्या होता है ... क्यूँ उस पर नहीं लिखा जाता .... ??

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  4. मंगलेश जी के कथन में मुझे यह दिखता है कि उन्हें आज के कवि कुछ जल्दबाज और लापरवाह किस्म के कवि लगते हैं ,जो किसी हद तक ठीक भी है ! उन्हें इस बात को लेकर शिकायत तो है लेकिन वे स्वयं आजकल की इस प्रवत्ति के प्रति कुछ न कहकर उसे और एक धक्का देने के मूड में दिख रहे हैं ! अब यदि दस लोगों को उठाकर नदी में फेंक दिया जाये तो दो-चार हाथ-पाँव मार कर तैरना सीख ही जायेंगे !

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  5. अरुण मिश्र ( मि‍सिर ) जी, अंतिम वाक्‍य का आपका रूपक-कथन ( अब यदि दस लोगों को उठाकर नदी में फेंक दिया जाये तो दो-चार हाथ-पाँव मार कर तैरना सीख ही जायेंगे ! ) एकदम सटीक है। कहना न होगा कि किसी भी वरिष्‍ठ का यह नजरि‍या नयों के लिए लाभप्रद तो नहीं ही है, सोच का यह अंदाज स्‍वयं में भी वाजिब कदापि नहीं। बहरहाल, इस पर बात होनी चाहिए। बहस को गति देने के लिए आभार...

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  6. प्रतिक्रिया और सद्भावना के लिए आभार गीता जी... आपका कहना सही है, स्‍त्री के संघर्ष-सृजन-कर्म पर नये सिरे से लिखा जाना चाहिए। उदारता और गंभीरता से बात होनी ही चाहिए...

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  7. Satya Mitra Dubey

    श्यामल जी, आप के इस ब्लाग को मैं पहले देख नहीं पाया था . आप ने बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है और इस पर सार्थक बहस की ज़रुरत है. गहन सामाजिक सक्रियता के अनुभव, समाज, साहित्य और विचारधारा की थोड़ी बहुत समझ , उनमें गहरी भागीदारी के आधार पर मैं यह कहने का दुस्साहस कर रहा हूँ कि सामान्य रूप से साहित्य और विशेष कर कविता का तदर्थ फतवों , हर कदम पर अनावश्यक अतिरेकी राजनीतिक छौंक, बदलती दुनिया और विचारधारा की आधी-अधूरी समझ के साथ उभरे दंभ भरे कट्टरवाद के कारण सामान्य रूप से साहित्य और विशेष कर आज की कविता में लोगों की रूचि घटी है . साथ ही साथ उसके जन-प्रभाव और सौंदर्य-बोध दोनों ( जान बूझ कर मैं दोनों को एक साथ रख रहा हूँ) में चिंताजनक ह्रास हुआ है.

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