बेखुदी बेवक़्त कभी बेमतलब और अक्सर बेसबब श्यामल रह


इल्म-ए-सफ़र दरिया ने जैसे सीखा बहते-बहते
यहाँ तक आ गये हम भी यूं ही चलते-चलते

मुक़ाम-ए-ज़िंदगी में कोई उस्ताद कहाँ हुआ किया
कुछ कहना-सुनना चल पड़ा यूं ही कहते-कहते

ख्वाहिश अब भी कि ज़माने से सीधे होते मुकाबिल
शिकस्त भी खाते तो बात अपनी यूं ही रखते-रखते

किसी ने साथ नहीं लिया न कोई पीछे ही मेरे आया
बियाबां चीरते चले गालिब-ओ-मीर गुनगुन करते

पांव अटके तो क़दम डगमग-डगमग हुआ किये
पता न था बदलेंगे वे लोग जो हम पर थे हंसते

लब खुलने से पहले ज़ुबां-ए-दिल हिलने लगता
हम चुप हो जाते अपनी खामोशी सुनते-सुनते

बेखुदी बेवक़्त कभी बेमतलब और अक्सर बेसबब
श्यामल रह गया यूं ही नहीं कुछ खास बनते-बनते
©श्याम बिहारी श्यामल

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About Shyam Bihari Shyamal

Chief Sub-Editor at Dainik Jagaran, Poet, the writer of Agnipurush and Dhapel.
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1 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (01-09-2018) को "आंखों में ख्वाब" (चर्चा अंक-3081) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेई जी को नमन और श्रद्धांजलि।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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