JAI SHANKAR PRASAD k jivan-yug par aadharit upanyas KANTHA : NAVNEET/march2011 me chhapi 10th dharavahik kist

विश्वम्भर नाथ जिज्जा को दूर से देखकर ही प्रसाद के होठों पर तिर्यक मुस्कान खिंच गयी। उन्हें लग गया कि यह महाशय अपने चोंच में फिर काशी दरबार का कोई न कोई किस्सा दबाये हुए ही आये होंगे! जबसे उन्होंने काशी नरेश के चीफ सेक्रेटरी के प्रधान सचिवालय में क्लर्क का काम शुरू किया है, तबाह-तबाह हैं! सम्भव है, वहां किसी सहकर्मी के दांव-पेच का शिकार बनने जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी हो और इसी कारण परेशानी महसूस कर रहे हों! इसके साथ ही यह भी सत्य है कि यह व्यक्ति जितना ही मेधावी है, उतना ही अस्थिर विचार का! कहीं दो-चार साल जमकर रह ही नहीं सकते। किसी की एक भी ऐसी-वैसी बात कभी बर्दाश्त नहीं कर सकते। पांव में चकरी घूमती रहती! जरा-सा ऊंच-नीच होते ही झोला उठाकर चल देते हैं! इस नौकरी में भी उनका रचनाकार-मन जम नहीं पा रहा। राज-काज के व्यवहार में उन्हें वहां अक्सर कुछ न कुछ ऐसा दिख ही जा रहा है, जो उनके लिए घोर असहमतिजन्य होता है! ऐसे क्षणों में जब मुण्ड धीपकर घूमने लगता है तो अपनी सीमा का ज्ञान होने के चलते वह वहां तो खून का घूंट पीकर रह जाते हैं किंतु यहां आकर अपना दर्द उड़ेलना हं भूलते। कुछ इस अंदाज में, जैसे वह भीषण अस्वीकार्य व घोर असहनीय परिस्थितियों में फंस चुके हों।
प्रसाद को यों तो जिज्जा का यह कार्य-व्यापार सिरे से पसंद नहीं, किंतु क्या करें! उनकी मनोदशा को देखते हुए सबकुछ चुपचाप सुन लेते हैं। चुप रहकर। यही सोचकर कि यदि ऐसे धीपते-धधकते आक्रोश को विसर्जन का अवसर नहीं दिया जाये तो यह व्यक्ति दरबार या अपने कार्यालय में कभी किसी भी दिन कोई तमाशा खड़ा कर स्वयं को संकट में फंसा लेगा! ऐसे अवसरों पर प्रसाद न चाहकर भी मंद-मंद मुस्कुराते चुप रह जाते हैं। कभी गुरु-गम्भीर जिज्ञासा तो कभी अन्यमनस्कता के साथ। ठोस मौन। सरायगोवर्द्धन या नारियल बाजार वाली गद्दी पर जिज्जा का मन खुलकर अपने विद्रोही मानस की अंगड़ाई प्रदर्शित करता है। बन्धन- मुक्ति के छलकते उल्लास के साथ।
जिज्जा के रोष-आक्रोश विसर्जन के दौरान कभी-कभी ऐसा कुछ भी निकल आता जिससे अवगत होना न सिर्फ अच्छा लगता है, बल्कि उसकी अनुभूति की प्रखरता का लोहा मानना पड़ जाता है! इसके साथ ही उनकी अत्यंत संवेदनशीलता व पर्याप्त ज्वलनशीलता का भी अनुभव होने लगता है! ऐसा कि जरा-सी चिनगारी भी निकट चमक जाये तो वह भभककर धधक उठेगा! दूसरे ही पल इस सृजनशील प्रतिभा के मद्देनजर उसकी तुनकमिजाजी पर गुस्सा आने लगता है- यह व्यक्ति जरा-सा सहनशील हो जाये तो कहां से कहां पहुंच जाये! लेकिन, कितना भी समझाओ, उस पर कहां कोई असर हो पा रहा है! क्या किया जाये! यह भी लगता है कि ज्यादा दबाव देने पर कहीं ऐसा न हो कि वह किसी दिन तुनक-तड़क उठे और नौकरी को प्रणाम कर चल दे! ऐसी घनघोर अध्ययन-वृत्ति और देश-दुनिया के बारे में हमेशा नयी से नयी जानकारी लेने-देने वाला व्यक्ति भला दूसरा कहां मिलेगा?
जिज्जा ने पास आकर अभिवादन किया। प्रसाद जैसे साये से जगे हों! वह तुरंत शुरू: क्या बतायें! दीवान ने महाराज को विश्वास के जाल में ही कैद कर लिया है! वे कई निर्णायक मामलों में भी उसे नीति बनाने तक की छूट दे चुके हैं! अंगरेजों ने काशी राज्य को स्वायत्त शासन की जो मान्यता दी है, उसका फायदा दीवान लूटने में जुट गया है! उसने अपनी करामात शुरू कर दी है। कई नये कर तय कर-करा दिये हैं! नगर के पथ-कर में इजाफा करवा दिया है। भवनों के निर्माण के लिए पूर्व आज्ञा अनिवार्य करवा दी है। इसके लिए भी एक नयी कर-तालिका घोषित हो गयी है। किसानों का लगान बढ़ा दिया गया है। एक तो कई साल से वर्षा की अनियमितता, इससे लगातार सूखे की काली छाया और इधर लगान में वृद्धि! किसान बिलबिलाने लगे हैं। इसकी परवाह किये बिना नयी कर-प्रणाली लाद दी गयी! ऐसा लगने लगा है, जैसे अंगरेजों से मिली स्वायत्तता को कर-जाल फेंकने का एक स्वर्णिम अवसर मान लिया गया हो। इससे जनता में क्लेश और रोष व्याप्त है। इसी क्रम में एक घटना हो गयी है! सुनिये... एक दिन दीवान ने सदल-बल पास के एक गांव का दौरा किया। साथ में तहसीलदारों का दल भी रहा। मैं भी इसमें शामिल था। लगान न देने वाले किसानों को पकड़-पकड़कर मंदिर के सामने मैदान में बुलाया जाने लगा। मैंने देखा, सामने आ रहे सभी किसान फटेहाल और भयाक्रान्त! तो, पहले एक-दो मुसाहबों ने एक-एककर सबको धमकाते हुए लगान जल्दी भुगतान कर देने की कड़वी चेतावनी दी, इसके बाद दीवान उठ खड़े हुए। उनकी आंखें अंगारे की तरह जलने लगीं। स्वर से जैसे चिनगारी छिटक रही हो। किसानों के ऊपर दीवान के शब्द कोड़े की तरह सट्-सट् गिरने लगे। गिरते गये, गिरते गये! इससे सारे विवश-बेहाल किसान जैसे रौंदे हुए पौधे की तरह पस्त! मुझे यह बहुत नागवार गुजरा। सभी लौट आये। मैं कई दिनों तक मर्माहत। उस दिन मेरे आहत मन को राहत पहुंची जब यह संकेत मिला कि ऐसी बातें उड़- उड़कर महाराज के कानों तक पहुंचने लगी हैं। ऐन उसी दौरान एक दिन बिलबिलाते हुए कुछ फटेहाल किसान काशी दरबार में आ पहुंचे। मैंने उनके बारे में जानकारी महाराज तक भिजवाने में कुछ भूमिका निभायी। इसका असर हुआ। किसानों को दरबार में पेश करने का आदेश हो गया। वे महाराज के सम्मुख लाये गये। खाली पांव, फटी बिवाइयों से भरे हुए। सजल लाचारगी से डबाडब डरी हुई आंखें। बोलने का आदेश होने पर उनमें से एक कुछ कदम आगे बढ़ा। उसने भींगे हुए शब्दों में बोलना शुरू किया। कृषि की खराब हालत, किसानों की फांकाकशी और ऐसे में लगान देने के लिए बनाये जा रहे दबाव की समूची स्थिति-परिस्थितियां सामने जैसे दृश्यमान हो उठीं। बादलों से अधिक अपना बदन बरसाने वालों की स्याह लाचारगी दरबार में हवा पर धुंए-सी तैरने लगी। सिंहासन पर महाराज बेचैन हो हिलते-डुलते रहे। किसान का एक -एक शब्द जैसे उनके अनुभूति-तंत्र पर ओले की तरह गिर रहा हो। पूरा दरबार यह महसूस करने लगा कि उसके आंसुओं ने महाराज को अपार दुःख और गहरी चिन्ता में डुबो दिया है!
जब वह बोलकर स्थिर हुआ तो महाराज ने तुरंत आहिस्ते सिर हिलाया, ‘‘ आप लोगों की पीड़ा को मैं समझ रहा हूं... अभी तो आपलोग जायें, शीघ्र ही आपलोगों तक हमारा नया निर्णय पहुंच जायेगा, जिससे आपकी यह परेशानी समाप्त हो जायेगी... ’’
किसानों का दल थोड़ा सहज हुआ। सबने झुककर अभिवादन किया और एक साथ पीछे लौट गये। उनके जाते ही महाराज ने आंखें मूंद ली और देर तक सिंहासन पर चिन्तानिमग्न बैठे रहे। उन्हें यह बात तीव्रता से अनुभूत होने लगी थी कि कर-वसूली की ऐसी दोषपूर्ण और कठोर नीतियां तो कभी भी आग को भड़का सकती हैं... क्या होगा यदि किसी दिन इसके विरुद्ध लोगों का अलग-अलग रोश संगठित होकर एक साथ फट ही पड़े! तब तो काशी राज्य को झंझावात से बचाना आसान नहीं रह जायेगा। सारी बातें सोचते-समझते हुए महाराज ने इसे गम्भीरतापूर्वक संज्ञान में ले लिया।
एक दिन मंत्रियों की एक आवश्यक बैठक बुलायी गयी। दीवान को लक्ष्य कर महाराज ने उंगली उठायी, ‘‘ ...‘कर’ का तो एक सर्वज्ञात अर्थ ‘हाथ’ होता है जबकि एक अन्य तात्पर्य टैक्स से है... मुझे लगता है कि इन दोनों अर्थों में निकट का एक आपसी रिश्ता भी अवश्य है! ‘कर’ यानी टैक्स ऐसे महसूस होने चाहिए जो प्रजा को सामने बढ़े हुए किसी सहयोगी ‘कर’ यानी हाथ की तरह दिखे, प्रहारात्मक आवेग-मुद्रा से लपकने वाले मुक्के या लात की तरह तो कदापि नहीं! ’’ सभा में सन्नाटा छा गया। महाराज की वाणी का ताप जेठ की धूप की तरह, जो सबके मन-मस्तिष्क को बर्छी की नोंक की तरह छूता रहा, ‘‘ ...मुझे पहले से ऐसी गुप्त जनसूचनाएं मिलती रही हैं कि राज्य भर में प्रजा को हमारे नये कर-प्रबन्ध नागवार गुजर रहे हैं... लोग इससे आहत हो रहे हैं... उन्हें नये करों से अपनी त्वचा नुंचने-छिलने जैसी दग्ध अनुभूति हो रही है... अगर ऐसा है तो इसे सफल और लाभप्रद नीति नहीं कहा जा सकता... प्रजा हमारे लिए किसी धेनु की तरह तो कदापि नहीं है जिसे हम जब जितना चाहें, दुह लें... मेरा तो मानना है कि प्रजा उस धरती की तरह है जिससे हमें अन्न-जल तो लेना है किंतु उसकी देखभाल माता की तरह करनी है...’’ सभी चुप। दीवान हक्का-बक्का। महाराज ने दीवान की ओर देखा तो एक क्षण के लिए उनकी वाणी का प्रवाह ठहर गया। तपते मुखमण्डल पर मुस्कान ऐसे आ गयी जैसे खूब तेज धूप के दौरान ही अचानक आसमान से वर्षा होने लगी हो। उनके शब्द अब शीतल बून्दों की तरह टप्-टप् बरसने लगे, ‘‘ ...राजा या राज्य को इस तरह कर लेना चाहिए जैसे सूर्य समुद्र से जल लेता है और समुद्र को कुछ मालूम नहीं होता... और फिर राजा को अपनी ओर से देना भी इसी तरह चाहिए जैसे वर्षा का जल बरसता है और सबको दिखाई देता है...
...जिज्जा भावपूर्ण शब्दों में सुनाते चले गये। प्रसाद ने चुपचाप सबकुछ बहुत ध्यान से सुना। बोलते-बोलते वे जैसे थक गये हों, सुस्ताने लगे।
प्रसाद कुछ देर चुप रहे। जिज्जा उद्विग्नता के साथ उनकी प्रतिक्रिया के प्रति जिज्ञासु बने रहे। इसे भांपते हुए उन्होंने सस्मित ताका, ‘‘ यार, तुम बात तो सही ही सोच-समझ रहे हैं’’
जिज्जा के चेहरे का तनाव थोड़ा-सा ढीला हुआ किंतु जिज्ञासा की उद्विग्नता कुछ और बढ़ गयी। प्रसाद ने इसे आंकते हुए उनके चेहरे पर स्नेहिल दृष्टि जमायी, ‘‘ इससे तो यही लग रहा है कि यह दीवान महाशय बहुत असहनीय व्यक्ति होंगे...किंतु व्यक्तिगत रूप से तुम्हें उससे टकराने की कोई जरूरत ही कहां है जब स्वयं महाराज तक उसे ठीक-ठीक समझ चुके हैं!... वैसे, राज-काज सब ऐसे ही चलता रहता है... कोई नहीं कह सकता कि तुमने अभी-अभी जो कर-प्रसंग सुनाया उसमें अकेले दीवान का खेल था या राजनीति की कोई उच्चस्तरीय अन्तर्चाल रही... तुम्हें बेशक लगा होगा किंतु मुझे हठात् यह विश्वास नहीं होता कि दीवान के स्तर से ही उक्त मत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय निर्धारित हो गया होगा... ऐसे मामलों में विफलता की दशा में राज्य हमेशा किसी कमजोर सिर पर ठीकरा फोड़कर स्वयं को बेदाग बचा लेने की चाल चलता है जबकि इसी में यदि सफलता हाथ लगी होती तो क्या जयजयकार दीवान की होती? ...असल में राजनीति इसे ही कहते हैं... यह वह प्रक्षेत्र है जहां अक्सर जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है वह प्रायः दिखाई नहीं पड़ता... ’’ जिज्जा मुंह बाये सुनते रहे, प्रसाद बोलते हुए मंद-मंद मुस्कुराने लगे, ‘‘...इसलिए मैं तो यही सलाह दूंगा कि तुम्हें अपने तईं ऐसी चीजों के प्रति बहुत अधिक उत्सुक या उन्मुख होना ही नहीं चाहिए... राजकाज का काम बड़े लोगों का खेल है... तुम्हारा इन चीजों से क्या लेना-देना! ...यही याद रखो कि तुम एक छोटे मुलाजिम हो, नौकरी करने गये हो... तुम यदि चुपचाप काम सीखने में ही अपना मन लगाओ तो यही तुम्हारे स्वयं के लिए अधिक लाभप्रद होगा... लग-भिड़कर तहसीलदारी के कागजात पढ़ना और समझना सीख लो ...इस काम में मुहर्रिर से मदद लेते चलो... तुम्हें इसी से फायदा होगा...’’
जिज्जा एक क्षण के लिए उदास हुए किंतु दूसरे ही क्षण उठ खड़े हुए। प्रसाद ने उन्हें रोका, ‘‘ ...बात पसन्द न आयी हो तो कोई बात नहीं! यह सलाह मात्र है जिस पर स्वयं विचार करने के बाद ही तुम्हें उन्मुक्त भाव से अनुसरण करना अथवा नहीं करना है, इसमें मेरी ओर से कोई दबाव तो कदापि नहीं है...  मुझे विश्वास है कि तुम अपना हित-अहित अच्छी तरह समझ- बूझ सकते हो... लेकिन अभी इस तरह अचानक उठकर खड़े क्यों हो गये भई ? कुछ देर और बैठो... अभी तुमसे एक आवश्यक बात करनी है... ’’
झेंप गये जिज्जा, ‘‘...आपकी बातें सलाह भर नहीं, मेरे लिए तो सीधे-सीधे आदेश हैं... जिनका हंसते या रोते हुए मुझे तो सिर्फ और सिर्फ अनुपालन ही करना होगा... ’’
‘‘ अरे, नहीं! ऐसा भी क्या! ’’
‘‘ हां, मैं गलत नहीं कह रहा हूं... मुझे इस बात का तो भली-भांति अंदाजा है कि आपके मुंह से निकली बात का वजन और अहमियत क्या हैं... यदि कभी आपकी कोई बात मुझे नागवर गुजरेगी तो इसका केवल और केवल यही तात्पर्य होगा कि मैं उसे समझ नहीं पा रहा होऊंगा... अभी जो कुछ भी आपने कहा है वह मैं पूरी तरह समझ पा रहा हूं... इसमें निस्संदेह मेरा ही हित है... लेकिन मैं भी आपको अपने बारे में क्या बताऊं ... चीजों को समझते हुए भी आवेग में आ जाने पर मैं स्वयं को बहने से कभी रोक नहीं पाता... मैं यह समझ रहा हूं, यह मुझमें एक बड़ी कमी है... ’’
‘‘ चलो, तुम्हें मेरी असहमतिजन्य बातों के पीछे की भावनाएं साफ-साफ दिख गयीं, यह मुझे बहुत अच्छा लगा... दरअसल, तुम्हारा मन भी तो एक रचनाकार का मन है... ऐसा मन जो व्यापक सर्वहित व सर्वन्याय के लिए ‘स्व’ की चुम्बकीय परिधि को सकुशल लांघकर उस विराट् भावना-मण्डल पर तैरता है जो धरती से आकाश तक वायुमण्डल की तरह लहरा रहा है... जैसे जल-तल पर डगमगाती नैया को लेकर उड़ने वाला पाल स्वयं को हवा के आवेग से नहीं उबार पाता वैसे ही रचनाकार भी संवेगात्मक मामलों में स्वयं को कहीं कहां रोक पाता है! ...वैसे मैं यह कहूं कि व्यक्ति यदि अपने भीतर व्यापक हित की भावनाएं जगाकर चल रहा हो और ऐसी सर्व-सार्व भावात्मक अनुभूतियों से स्वयं और अपने क्रिया-कलाप जोड़ कर आगे बढ़ता हो तो यह कोई कमी नहीं बल्कि एक दुर्लभ उपलब्धि है! ’’ प्रसाद की पारदर्शी वाणी से अपार मधुरता महक बनकर उठती-फैलती रही।
स्थिर बैठे मुस्कुरा रहे हैं जिज्जा, किंतु वैचारिक आलोड़न मुखमण्डल पर भंवर की तरह गोल-गोल घूम रहा है। प्रसाद ने हांक लगायी तो चेखुरा तस्तरी में मगदल लिए हुए आ खड़ा हुआ। जिज्जा की आंखें मिठास से भर गयीं, ‘‘ बाबूस्साब, आपके यहां के मगदल का सचमुच जवाब नहीं... इसके आगे तो राजदरबार के मगदल का स्वाद भी फेल हो जाता है... ’’
प्रसाद मुस्कुराये, ‘‘ मेरे आइटम हैं ही ऐसे... केवल मगदल ही क्यों, जैसे स्वयं तुम भी! क्या तुम्हारी संवेदन-सजगता के आगे पूरा राजदरबार फेल नहीं है ! ’’
ठहाका गूंज उठा। जिज्जा हंसते-हंसते बेहाल।
प्रसाद स्वभावतः अब प्रसंग बदलने को बेचैन। अचानक सामने रखे ‘लीडर’ अखबार पर ध्यान चला गया। उसे उठा लिया। पन्ने पलटने लगे, ‘‘ यार देखो, विश्व-युद्ध की समाप्ति पर कैसे-कैसे बयान सामने आ रहे हैं...’’ उन्होंने पलटकर एक पन्ना स्थिर किया, ‘‘...दक्षिण अफ्रीका के प्रधानमंत्री का बयान जरा देख लो- ह्युमेनेटी हैज बीटेन इट्स टीनेट्स, एण्ड इज वन्स मोर ऑन द मार्च!...’’
जिज्जा जिज्ञासा से भरे, टुकुर-टुकुर ताकते रहे। प्रसाद ने प्रश्नवाचक दृष्टि उठायी, ‘‘ इस ‘ह्युमेनेटी’ का मतलब समझ पा रहे हो ? ’’
जिज्जा हल्के मुस्कुराये किंतु दूसरे ही पल संजीदा हो गये।
प्रसाद आगे बोले, ‘‘ इसका मतलब ‘गोरों की ह्युमेनेटी’ से है... बेचारे कालों में अभी ‘मार्च’ करने की कहां शक्ति है! ’’
एक साथ दोनों ठठा पड़े। जिज्जा अब तक लगभग सहज। प्रसाद ने चुटकी ली, ‘‘ यार, मुझे एक बात बहुत नागवार गुजरती है कि पश्चिम वालों के पराक्रम में भी धूर्त्तता इतनी अधिक मिश्रित है कि युद्ध-भूमि की सफलताएं भी उनकी छवि को किसी विजयी शेर का आकार नहीं दे पा रहीं, वे बार-बार किसी कामयाब काइयां लोमड़ी की तरह ही मुझे दिखाई पड़ रहे हैं... तुम तो देश-दुनिया की हलचलों पर नियमित दृष्टि रखने वाले लोगों में हो, इधर कुछ दिन के ‘लीडर’ को ही पलट जाओ... तो मेरी बात अधिक स्पष्टता से महसूस कर सकोगे... ’’
प्रसाद एक पल ठहरे, फिर व्यंग्य से मुस्कुराये, ‘‘ वह चाहे ब्रिटिश प्रधानमंत्री लायड जार्ज हों या अमेरिकी राष्ट्रपति उडरो विल्सन अथवा फ्रेन्च प्रधानमन्त्री क्लीमेन्सू ही... सभी बयान तो ऐसे-ऐसे दे रहे हैं, जैसे शान्ति के पुजारी यही लोग हों और युद्ध थोपने का काम तो आकाश-मार्ग से किसी दैत्य ने किया हो...! ’’
कहने का अंदाज कुछ ऐसा कि जिज्जा ठठा पड़े। इसके विपरीत प्रसाद एकदम सख्त। यह देख वह तुरन्त चुप। महसूस हुआ कि उनके अनावश्यक हंस जाने से बात का प्रवाह बाधित हो गया है! प्रसाद की वाणी में कठोरता आ गयी, ‘‘ ...आंसू बहाने वाला घड़ियाल संवेदनशील नहीं वरन् ऐसा अनोखा दुष्ट और महामक्कार होता है जो अश्रु तक का बेजा और भ्रामक इस्तेमाल कर रहा होता है, सिर्फ धोखा देने के लिए... ताकि वह सहजता और सफलतापूर्वक सामने वाले को अचूक ढंग से अपना शिकार बना सके... इसीलिए तो कह रहा हूं भ्रम फैलाकर धोखे से शिकार करने वाला पराक्रम-प्रभावोत्पादक सिंह नहीं, बल्कि मन में घृणा व मुंह में फेनदार थुक भर देने वाला कायर-काइयां मगरमच्छ ही होगा, इससे अलग कुछ और नहीं! ’’
चुपचाप सुनते रहे जिज्जा। प्रसाद जैसे अपने दागदार समय-संदर्भ की साक्षात् समीक्षा-परीक्षा करने में जुट गये हों, ‘‘ ...लेकिन मैं तुम्हें एक बात बता दूं ...सोवियत रूस में लेनिन की जो भूमिकाएं सामने आ रही हैं, उनमें हमारे पूरब का एक संस्कार तो एकदम साफ दिख रहा है कि वह मूलतः किसी भी छद्म से मुक्त हैं ही... सर्वजन का उनका सिद्धान्त इस निमित्त किसी भी सख्ती को दवा की कड़वी घूंट की छवि दे रहा है... यानी कड़वी चाहे जितनी हो उनकी खुराक का लक्ष्य तो सर्वथा सकारात्मक यानि रोगमुक्ति ही है... इससे इतर नकारात्मक या हानिप्रद तो कदापि नहीं... ’’
जिज्जा के लिए यह पहला अवसर है जब सामने बैठे प्रसाद विश्व के समकालीन परिदृश्य पर ऐसे धाराप्रवाह व सुचिन्तित विचार दे रहे हैं! इतने मुखर और पारदर्शी शब्दों में! उन्हें इस तरह बोलते देखना-सुनना अद्भुत अनुभव। पहले तो यह थोड़ा चौंकाने वाला लगा किंतु दूसरे ही क्षण मन के भीतर से ही यह तर्क उठा- आखिर वे वर्त्तमान से लेकर इतिहास के गहन- गह्वर हजारों-हजार सालों के काल-शिला को कलम की नोंक से उलटते-पुलटते रहने व देखने-परखने वाले काल-परीक्षक जो हैं! ऐसे में तो यह मुमकिन ही नहीं कि कोई भी समय, परिदृश्य अथवा गत-आगत, खोया-खियाया या खुलता-खिलता इतिहास-भूगोल उनसे छूट जाये... इसी अर्थ में तो वे और उनका यथार्थवाद विशिष्ट हैं... केवल उपस्थित तक ही सीमित- सिमटे नहीं, बल्कि विगत-आगत से लेकर अनागत तक के विराट् परिदृश्य-विस्तार तक सहज आवाजाही सम्भव बनाते हैं और सबको शब्दबद्ध कर अक्षर-रूप में सामने रूपायित कर देते हैं! प्रसाद की वाणी प्राण-स्रोतस्विनी बयार की तरह धड़कती-बहती रही, ‘‘...मिट्टी के गुण-सूत्र आप आसानी से पहचान लीजिये न, कहां है इटली के मुसोलिनी और जर्मनी के हिटलर की भूमिकाओं में कोई व्यापक हित या आम कल्याण का दृष्टिकोण? फासिस्टवाद और नाजीवाद, दोनों में मगरमच्छ वाली नकली अश्रु-संवेदना है... उद्दाम बर्बरता कभी कोई मानवीय उपक्रम सम्भव कर ही नहीं सकती... यह सिर्फ धोखे अर्थात् दलदल व धंसान ही पैदा कर सकती है...’’
उन्होंने विराम लिया तो जिज्जा ने अनुकूल माहौल देख मुंह खोला, ‘‘ ...सच कहूं तो मैं आज आपका सर्वथा नया रूप देख रहा हूं... मैं तो अब तक आपको एक कट्टर देश-भक्त अवश्य मानता रहा किंतु यह नहीं जान पाया था कि आप समूचे विश्व के फलक को लेकर भी ऐसे चिन्तन-मनन के लिए अवकाश निकाल पाते होंगे... ’’
प्रसाद मुस्कुराये, ‘‘ ...जो अपनी मां-बहनों को टूटकर प्यार कर सकेगा, वही दूसरी तमाम स्त्रियों का भी सम्मान कर सकता है... फिर आप यह क्यों भूल रहे हैं कि हमारे चिन्तन-संस्कार की नींव में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संकल्प-मंत्र निहित है... हमारी चिन्ता-धारा में समूची मानव जाति और समतावाद सम्मिलित हैं... आपको मेरे दृष्टिकोण के बारे में यह तो अवश्य पता होगा कि व्यक्तिगत रूप से मैं आज के अपने नेताओं में बालगंगाधर तिलक का सर्वाधिक प्रशंसक हूं किंतु हाल के दिनों में मोहनदास करमचन्द गान्धी मुझे एक ही कारण से पसन्द आ रहे हैं... ’’
जिज्ञासा से फैल गयीं जिज्जा की आंखें। प्रसाद दूसरे ही क्षण आगे बोले, ‘‘... वह यह कि इस शख्स ने राजनीति के अस्त-व्यस्त परिदृश्य पर खड़ा होकर भी महान जीवन-मूल्यों को नवीकृत करने के प्रति जो भूमिका निभाने का कार्य शुरू किया है, यह अद्भुत है... उनके अभियानी प्रयासों में सत्य के प्रति जो नया आग्रह सामने आ रहा है, इससे तो मैं मुग्ध हूं... उसी तरह समाज की मुख्यधारा से कटे हुए चिर उपेक्षित-दमित वर्गों के प्रति उन्होंने जो उत्थानकारी प्रयास शुरू किये हैं, यह बेमिसाल है! ... इसीलिए तो हाल के दिनों में उन्हें लेकर विश्व भर में एक आम-स्वीकार्यता बढ़ी है... यह व्यक्ति लेनिन की तरह एक अन्तर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता अर्जित करता आगे बढ़ रहा है... मैं राष्ट्रीय परिदृश्य में वैचारक तौर पर उनके साथ बहुत दूर तक तो स्वयं को नहीं खड़ा कर पा रहा किंतु इस बात का कायल अवश्य हूं कि इस शख्स को विश्व के अनेक देश अपने नेता के रूप में देख रहे हैं... यह हमारी मिट्टी के गुण-सूत्र की सर्वस्वीकार्यता ही तो है... ’’
प्रसाद अब चुप, किंतु सिर के छोटे-छोटे खिचड़ी-खूंटीदार बालों पर फिरता उनका बायां हाथ बता रहा है कि उनका चिन्तन-चक्र अब भी तेज-तेज घूम रहा है! जिज्जा ने विनम्रता से प्रश्न किया, ‘‘ ...चीन में जापान की जो सख्त नीतियां चल रही हैं, इसे आप किस दृष्टि से देख रहे हैं, क्या यह भी मिट्टी के गुण-सूत्र सिद्धान्त का ही कमाल है ?’’
प्रसाद हंसे, ‘‘ ...अब मेरी बात को तुम इस तरह मजाक न बनाओ ! तब तो कोई यह भी प्रश्न उठा सकता है कि कृष्ण और कंस समान मिट्टी-मुल्क ही नहीं बल्कि आपस में भांजा-मामा भी थे, फिर क्यों एक कैसा वीर-महावीर, नीतिज्ञ-महानायक जबकि दूसरा कैसा अत्याचारी-दुष्ट -कायर और नीतिहीन खलनायक! ’’
जिज्जा को हंसी तो आयी किंतु उन्होंने स्वयं को संयत रखा। प्रसाद ने बात आगे बढ़ायी, ‘‘...देखो, मैं यहां पर जापान की नीति को अपेक्षाकृत गलत नहीं मानता...’’
‘‘...अच्छा! यानी आप जापान का समर्थन कर रहे हैं ? ’’
‘‘..अरे, ऐसा कदापि नहीं! अपेक्षाकृत गलत नहीं मानना क्या सर्वथा सही मान लेने का पर्याय है?... ’’
‘‘...तो ? ’’
‘‘...तो क्या! तुम एशिया के भविष्य के बारे में सोचकर देखो... जब पूर्व और पश्चिम का महायुद्ध होगा तो उस समय एशिया की लड़ाई लड़ने वाला कौन होगा ? नेपाल और भूटान की सीमाओं को चीरती हुई और पर्शियन गल्फ ;ईरानी खाड़ीद्ध से शत्रु की फौजें और जंगी बेड़े लड़ने आयेंगे... वैसे आज अभी से हम यह नहीं कह सकेंगे कि वह शत्रु कौन हो सकता है किंतु यह सम्भव है कि उस महायुद्ध में भूमध्य सागर और स्वेज नहर भी अंगरेजों के लिए बन्द हो जाये और एटलान्टिक एवं पैसिफिक सागरों में विश्वव्यापी घमासान छिड़ जाये... ’’ उनकी आंखों में जैसे पृथ्वी घूम रही है, गोल-गोल घूमती-नाचती किसी बच्ची की तरह। वाणी में बज रही है उसी के नन्हे पांवों की थाप और पायल,  एक साथ- रुन्-झुन् रुन्-झुन् रुन्-झुन् रुन्-झुन्!
जिज्जा ने जैसे भूल से छूट गये किसी छोर को लपककर पकड़ लिया हो, ‘‘ ...और ऐसे समय में अमेरिका ? उसकी क्या भूमिका हो सकती है ? ’’
प्रसाद क्षण भर में जैसे ऊर्जस्वित हो उठे, ‘‘...और तो मेरी कोई धारणा चाहे भले गलत या असत्य हो जाये किंतु अमेरिका के बारे में यह अंदेशा शायद ही असत्य साबित हो कि...’’ उनका मुखमण्डल अभिव्यक्ति-दग्धता से भास्वर हो उठा। जिह्वा पर वाक्य क्षण भर के लिए जैसे छूटने से पहले तीर की तरह पीछे खिंचे। पल-भर का अन्तराल लेकर प्रसाद ने आंखें फैलाते हुए अपने दोनों हाथों को मुट्ठी में बदल लिया और जैसे हवा पर बलाघात करने लगे, ‘‘ ... अमेरिका ऐन वक्त पर मानव जाति को धोखा देगा!’’
जिज्जा को लगा कि बच्ची पृथ्वी ने अपने दोनों हाथ पंखों की तरह फैला दिये हैं और गोल-चक्करी नृत्य की गति अति तीव्र कर दी है। उसके पांवों पर पायल तेज-तेज सिर पटके जा रही है! यह हाहाकार है या विद्रोह?
तैंतालीस
दालमण्डी की धमनी यानि नारियल गली में खनकते कहकहे प्रवाहित हो रहे हैं। सुंघनी साहु का प्रतिष्ठान। प्रसाद की मंडली जमी है। कलकत्ते से आये और सब पर छा गये हैं पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र। चौड़े मुंह का पायजामा। कुरते पर बेलदार वास्केट। बगलों से उठती बेला की भीनी सुगन्ध का झकोर। खूब अलमस्ती के साथ झूम-झूमकर बोलने का अंदाज। व्यास ने सहमते हुए सवाल किया, ‘‘ बेचन भाई, ‘मतवाला’ में आजकल क्या चल रहा है, कुछ हमलोगों को भी बताइये... महादेव बाबू और मुंशी नवजादिकलाल श्रीवास्तव के क्या हाल हैं? मुंशी जी से आपका इन दिनों कैसा चल रहा है? आप दोनों की रस्साकशी जारी है या रस्सा अब तक टूट-दरक चुका है ? ’’
‘‘ अरे भइया! हमसे अभी साहित्य-वाहित्य की बात मत करे कोई! नो कलकत्ता, नो ‘मतवाला’! नो मंुशी, नो महादेव, नो निराला! ...कलकŸो में ही मन समुद्र रहता है, काशी में आ जाता हूं तो यह गंगा हो जाता है! ’’ खूब डोलते-मचलते हुए वे जैसे झझके, ‘‘...मैं आज अभी किसी भी साहित्यकार से पहले यहां किसी ऐसे व्यक्ति से बात करना चाहूंगा जो विशुद्ध आदमी हो! न राजनीतिज्ञ, न साहित्यिक, न समाजसेवी, न आचार्य, न प्राचार्य... एकदम अक्षुण्ण मानव मात्र! ’’
शांतिप्रिय द्विवेदी के यंत्रबद्ध चौकन्ना कानों में बात घुस गयी। रहा नहीं गया। उन्होंने अपने बेचैन अंदाज में चिढ़ छलकायी, ‘‘...तब तो आप नाहक ही यहां प्रसाद जी की अड़ी ;अड्डेद्ध पर आ गये! यह तो वैसे ही हुआ कि कोई व्यक्ति स्वेच्छया या बल्कि जबरिया किसी बारात में घुस जाये और फरमाये कि अब वह यहां अभी शांत-चित्त होकर कुछ मनन-मंथन करना चाहता है! अरे भाई, आपको साहित्यकारों से परहेज करना है तो इस जगह आये ही क्यों! ’’
सभी हंसने लगे। उग्र बोले, ‘‘ अरे, भइये! ऐसा नहीं! मैं तो केवल यह जानना चाहता हूं कि अगर यह कहा जाये कि एक मिनट में प्रसाद जी के इस अड्डे पर कोई एक विशुद्ध मनुश्य खोजना हो तो मिल सकता है कि नहीं! ’’
‘‘ अब आज तो यह यहां कत्तई सम्भव नहीं हो सकेगा... खुद भगवान भी चाह लें, शायद तब भी नहीं! ’’ यह दृढ़ ऐलान किया चट्टान से जमे गुरु-गम्भीर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने।
‘‘ और दिन अगर ऐसा सम्भव होता रहा हो तो यह आज भला क्यों असम्भव होगा?... ’’
‘‘ इसलिए कि आज यहां का माहौल अब कुछ ही मिनटों में पटरी से उतरने वाला है... ’’
‘‘ क्यों भला ? ’’
‘‘ क्योंकि यहां उग्र नाम का एक विशिष्ट जन्तु आ गया है...! ’’ आचार्य शुक्ल की बिच्छूदार मूंछें तो थोड़ी-सी ही हिलीं किंतु ठहाकों से पूरा माहौल पतंग की तरह तेज-तेज खिलने-उधियाने लगा।
प्रसाद अपनी जगह जमे मंद-मंद मुस्कुराते रहे।
सामने से आते मोहनलाल रस्तोगी को देख दास ने फिकरा कसा, ‘‘ लो भैये उग्र! आ गये एक विशुद्ध मानव! एकदम साहित्य-मुक्त जीव हैं किंतु बाबू साहब के पक्के संगतिया हैं! ’’
रस्तोगी सामने आ गये तो उग्र ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिये, ‘‘ भाई साहब, मैं उग्र हूं... और ... ’’
रस्तोगी ने स्थान ग्रहण करते हुए बात को बीच में ही काट दिया, ‘‘ ...मैंने तो सुना है कि बाबूसाहब छायावाद चलाते हैं, आप यहां अब कोई उग्रवाद चलाने आये हैं क्या ? ’’
हंसी झरझराकर हरसिंगार की तरह बिछ गयी। उग्र ने अपनी बात फिर शुरू की, ‘‘ मजाक नहीं! मैं कुछ पूछना चाहता हूं... ’’
‘‘ तो पूछिये न! डरता कौन है...! ’’ रस्तोगी की इस औचक हाजिरजवाबी पर प्रसाद स्वयं चकित।
‘‘ मुझे यह तो पता चल चुका है कि आप प्रसाद जी के मित्र हैं! ...वैसे, आप करते क्या हैं...? ’’
‘‘ सबको टोपी पहनाता हूं! ... ’’ रस्तोगी ऐन उग्र के पास जाकर पंक्तिबद्ध हुए।
फिर ठहाका। प्रसाद ने आवश्यक हस्तक्षेप किया, ‘‘ ऐ भाई, ये हमारे व्यक्तिगत अभिन्न मित्र हैं...’’
‘‘ व्यक्तिगत मतलब? ...और हमलोग क्या आपके अव्यक्तिगत मित्र हैं...?’’ दास ने हंसकर सवाल खड़ा किया।
‘‘ जो साहित्य या राजनीति आदि क्षेत्रों के लोग हैं वे आखिर किसी के व्यक्तिगत मित्र कहां रह पाते हैं? ...स्वभावतः और विवशतावश सार्वजनिक ही होकर दम लेते हैं... ’’ प्रसाद बहुत महीनी से कह गये।
व्यास अचानक उतावले होने लगे। दास की ओर मुड़े और बीच में ही अपनी बात जोड़ दी, ‘‘ आपका तो भैया, अकेले प्रसाद जी से काम चल कहां पाता है! मैथिलीशरण जी का प्रयोग तो आपको करना ही पड़ जाता है न! ऐसे में आप व्यक्तिगत मित्र कहां रहे... ’’
सभी सन्न। दास से जैसे गर्म लोहा छू गया हो। चेहरा पल भर में धीपकर लाल। खमखमा गये। स्वर आग जैसा, ‘‘ क्या मतलब ? ’’
व्यास के मुंह खोलने के पहले प्रसाद ने गतिपूर्वक हस्तक्षेप किया, ‘‘ ...तो मैं अपने मित्र रस्तोगी जी के बारे में विशेषकर उग्र जी को एक यह जानकारी दे दूं...!’’
दास शिथिल पड़ गये। जैसे मीलों दौड़कर आये हों! सीना भाथी की तरह चलता रहा। वे मुंह नीचे झुकाये स्वयं को सहज करने के प्रयास में जुट गये। सबका ध्यान उन्हीं पर मंडराने लगा। व्यास को काटो तो खून नहीं।
प्रसाद ने तपते तनाव पर अंकुश लगाने का उपक्रम जारी रखा, ‘‘...तो वह यह कि रस्तोगी भाई सचमुच टोपी की तिजारत करते हैं! यहीं बगल में इनकी टोपी वाली दुकान भी है... नियम से मेरे पास रोज आकर घंटा-दो घंटा बिताते हैं... यानी बैठते हैं प्रतिदिन साहित्यकारों के पास, किंतु साहित्य लिखने-पढ़ने से कोई दूर-दूर तक रिश्ता-नाता नहीं बनाया... वैसे जब सिर्फ हमदोनों साथ होते हैं तो अपने घर और शहर से शुरूकर जीवन के सभी पहलुओं पर देर तक बतियाते-पगुराते रहते हैं... ’’
‘‘ समझ गया... समझ गया...!’’ खास ढंग से सिर हिलाकर सबको हंसाते हुए उग्र ने आगे पूछा, ‘‘ आप मुझे एक ही बात बता दीजिये कि आप प्रसाद जी के मित्र क्यों हैं ? ... ’’ 
‘‘... शायद इसीलिए क्योंकि मैं एक साधारण आदमी हूं... कोई साहित्यिक-वाहित्यिक नहीं! ’’ सभी गौर से रस्तोगी को ताकने लगे। वह आगे बोले, ‘‘...भई, मैं अगर साहित्यिक रहता तो यहां रोज बाऊस्साब के साथ एक बार मेरा भी मामला फंसता ही फंसता! ... ’’
उग्र ने प्रसाद की ओर से दृष्टि उठायी और फिराते हुए रस्तोगी पर लाकर टिका दी, ‘‘ बाबूसाहब तो बाबूसाहब ही हैं! आपको मित्र चुनने के पीछे इन्हीं की दूरदृष्टि रही होगी... आज के समय में यदि ऐसा कोई मित्र मिल जाये जो केवल चुपचाप सुने ही सुने और सचमुच कुछ समझने की जुर्रत भी न करे... तो इससे बड़ा सौभाग्य भला दूसरा क्या हो सकता है! ’’
सभी हंसने लगे। उग्र मचल-मचल कर जैसे अभिनय कर रहे हों, ‘‘ कलकत्ता की बात यह कि वह कलकत्ता तो है लेकिन महज कलकत्ता भर, बनारस तो कदापि नहीं! ...जैसे बनारस थोड़ा-सा कलकत्ता, थोड़ा-सा हैदराबाद, थोड़ा-सा नेपाल, थोड़ा-सा चंडीगढ़ आदि-आदि हो-होकर अंततः एक छोटा-सा हिन्दुस्तान है, यह विशेषता अन्य किसी नगर-महानगर में इस तरह कहां है! ...मैं तो कभी-कभी सोचता हूं कि ‘मतवाला’ को नमस्कार कर दूं और कलकत्ता छोड़कर बनारस ही आकर जम जाऊं... और अपना पुराना ‘भूत’ फिर जगा दूं! इसके जितने भी दस-बारह अंक निकले थे उनका बहुत स्वागत हुआ था... शुरू हो तो मेरे खयाल से इसका फिर वैसा ही स्वागत होगा... ’’
प्रसाद ने टोका, ‘‘ आप सोचते-सोचते भटकें नहीं! आपको अभी जो मंच ‘मतवाला’ के रूप में मिला है इससे स्वयं आपके रचनाकार को भी लाभ हुआ है और एक तरह से हिन्दी भाषा को भी... ऐसे में अकारण इस अनुकूल परिस्थिति को अलविदा कहने की भला क्या जरुरत! ... ’’
‘‘ बाबूसाहब, आप कह तो ठीक ही रहे हैं किंतु असल में मेरी यह खोपड़ी ही कुछ टेढ़ी है न! इधर रायल्टी के कुछ रुपये आ गये हैं जो जेब में भूचाल मचाये हुए हैं... ऐसे में मेरा मन बार-बार अब यही कह रहा है कि चुनार में गंगातट पर काले पत्थरों का एक मकान बनवा ही डालूं और उसका नाम रखूं ‘श्मशान’! ...इसके बाद इसी ‘श्मशान’ से ‘भूत’ का पुनर्प्रकाशन भी शुरू कर दूं! ’’
सभी हंसने लगे। आचार्य शुक्ल की गुजगुजी आंखें फैलीं, ‘‘...नये मकान ‘श्मशान’ से ‘भूत’ का पुनर्प्रकाशन शुरू करने से पहले सम्पादक यानी आप स्वयं का नया नामकरण भी कर लें तो ज्यादा अच्छा रहेगा... आपके लिए एक यह नाम सबसे सटीक होगा ’’
‘‘ बहुत अच्छा! सुझाएं... कौन-सा नया नाम मेरे लिए है आपके पास... ? ’’
‘‘ पिशाच ! ’’ आचार्य शुक्ल ने तपाक से कहा।
ठहाका भरे गगरे की तरह फूट पड़ा। हंसते-हंसते उग्र सबसे अधिक बेहाल।
ठंढई और पान-सुर्ती का एक और दौर पूरा होने को आया।
उग्र ने व्यास से कहा, ‘‘ चलो, भैये! बाबा विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा के दर्शन तो कर लें... उसके बाद आज जमकर बूटी छानी जायेगी! ’’
शांतिप्रिय द्विवेदी ने पूछा, ‘‘ आप इन दिनों आस्तिक हैं क्या ? ’’
‘‘ अन्न के बिना रह नहीं सकता इसलिए अन्नपूर्णा माता का दर्शन तो अनिवार्यता भी है और विवशता भी...! ...और बाबा का दर्शन करने के लिए आस्तिक होने की भला क्या जरुरत? ...अरे, मैं आखिर ‘भूत’ का भूतपूर्व सम्पादक व नया पिशाच जो हूं... इसलिए भूतनाथ तो मेरे विभागाध्यक्ष ही हुए न?  ’’ फिर ठहाका।
आचार्य शुक्ल ने सहमति में तेज-तेज सिर हिलाया, ‘‘ बिल्कुल सही! बिल्कुल सही कह रहे हैं आप... बाबा तो आपके ही विभागाध्यक्ष हैं लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही... ’’
सबने कुछ चटपटी सुनने की उम्मीद के साथ उनकी ओर ताका। उग्र भी स्वयं पर किसी सम्भावित हमले के प्रति सतर्क। बहुत मासूमियत से पूछा, ‘‘ ऐसा क्या है भला जिसे आप जैसा ऐतिहासिक समझदार भी नहीं समझ पा रहा? ’’
आचार्य शुक्ल ने अपनी मंद मकरंद शैली कायम रखी, ‘‘...जब आप अपने रहने के लिए ‘श्मशान’ बनवाना चाहते हैं और वहीं से ‘भूत’ का पुनर्प्रकाशन भी करने को इच्छुक हैं तो इसके लिए स्थान के रूप में चुनार के गंगातट का चयन करने की गलती क्यों कर रहे हैं?...’’
‘‘ ...मैं समझा नहीं... आप कहना क्या चाहते हैं...? ’’
‘‘ ...अरे भाई, आपका यह ‘श्मशान’ तो यहीं मणिकर्णिका या हरिश्चन्द्र घाटों पर ही कहीं बनना चाहिए न! ... ’’
सभी हंसने लगे। उग्र झेंप गये। आचार्य शुक्ल का मुखमण्डल अब सख्त हो गया। वाणी में ताप, ‘‘ ... इस तरह के उल्टे-सीधे सोच-विचार दरअसल लोगों को चौंकाने की इच्छा-युक्ति के ही प्रतिफल हैं... इस तरह आप साहित्य में बहुत आहिस्ते-आहिस्ते एक ऐसा जहर मिला रहे हैं जो अभी तो मस्ती और मनोरंजन का मजेदार स्वाद दे रहा है किंतु अगर दुर्भाग्य से आगामी पीढ़ियों द्वारा आपका लगातार अनुकरण-अपसंस्करण होता चला जाये तो अनर्थ हो जायेगा... हिन्दी साहित्य की पूरी दिशा-दशा ही उलट-पलट जायेगी... यहीं काशी के रामकटोरा में उधर बैठकर एक तरफ मुंशी प्रेमचन्द तो दूसरी तरफ इधर गोवर्द्ध्रनसराय में विराजमान प्रसाद किस तरह साहित्य को गम्भीर अभिव्यक्ति और व्यापक लक्ष्यपूर्ण विमर्श के मंच-माध्यम का आकार देने में जुटे हैं, यह पूरा हिन्दी संसार समझ रहा है... किंतु ऐसे सारे उपक्रम आपके ऐसे अगम्भीर कार्यों से अंततः मिट्टी में मिलकर रह जायेंगे... आपकी अगर चल गयी तो पूरा साहित्य-क्षेत्र ही एक बारहमासा होलियाना इलाका होकर रह जायेगा... जहां भोंडे और अगम्भीर प्रलाप धुंध की तरह गहराकर मुख्य-धारा में छाये रहेंगे... ’’
सभी चुप। उग्र अप्रत्याशित ढंग से धैर्य धारण किये सिर झुकाये बैठे रहे। प्रसाद को उनका यह संयम-भाव राहत देने वाला लगा। आचार्य शुक्ल आंखें मूंदकर चुपचाप बैठे स्वयं के शरीर को हल्के-हल्के प्रकम्पित करते रहे। इससे उनके मानसिक उद्वेग का संकेत। दास और व्यास मुंह बंद किये ही बीच-बीच में आपस में एक-दूसरे को देख-देख उपस्थित तनाव को लक्ष्य कर होंठ बिचकाते रहे।
आचार्य केशव प्रसाद मिश्र ने अपने स्नेहिल मधुर शब्दों से इस तनाव को खुरचा, ‘‘... चलिये, ठीक है! रसोई में नमक की भी कोई कम भूमिका नहीं! बगैर इसके स्वाद कहां आ पाता है!... प्रेमचन्द हिन्दी के कथा साहित्य को यथार्थ की एक ऐसी जमीन दे रहे हैं जिस पर उगी रचना यदि हर आम व खास को झिंझोड़ेगी और समाज के प्रति सोचने को विवश करेगी... तो दूसरी ओर प्रसाद जन-जन में जातीय आत्मगौरव जगाते हुए चिन्तन-मनन का जो शिखर रच रहे हैं इससे नये सिरे से एक जनजागरण खड़ा होगा और हिन्दी साहित्य को क्लासिकी की ऊंचाई भी उपलब्ध होना तय है... इस तरह हिन्दी साहित्य के बड़े लक्ष्य कहीं से बाधित नहीं हो रहे और बड़े सधे ढंग से आकार ग्रहण कर रहे हैं... अब आप यह बतायें कि साहित्य का एक काम तो पाठक को बीच-बीच में मनोरंजन भी देते चलना है, लेकिन क्या यह लक्ष्य किसी भी तरह प्रेमचन्द या प्रसाद के हाथों सध पाना सम्भव है? इसके लिए तो हमें एक उग्र चाहिए ही चाहिए न! ... लेकिन हां! यहां हमेशा यह ध्यान दिये चलना आवश्यक होगा कि रसोई में नमक स्वादानुसार ही पड़े... चुटकी-आध चुटकी भर ही! ऐसा न हो कि यह पंसेरी के हिसाब से डलने लगे... ऐसा होने पर तो अनर्थ ही हो जायेगा... बहरहाल एकाध चुटकी तो सहनीय ही है!...’’
तनाव तरल हो चला। उग्र मुस्कुराने लगे। प्रसाद भी। आचार्य मिश्र अपनी बात को आगे बढ़ाते चले गये, ‘‘ ...मैं तो कहूंगा कि जिस तरह उग्र की ‘चन्द हसीनों के खतूत’ और ‘दिल्ली का दलाल’ जैसी पुस्तकें धड़ाधड़ बिक रही हैं और इससे इन्हें रायल्टी के रूप में अच्छी-खासी आमदनी होने लगी है, हिन्दी में यह एक नयी सम्भावना का पट खुलने जैसा अनुभव है... ऐसी प्रशंसनीय स्थिति सम्भव तो हुई! ...अब बाकी लेखक भी अपना दारिद्र्य दूर करने के लिए एक-दो ऐसी किताबें लिखकर स्वयं को आजमा लें तो इसमें कोई हर्ज नहीं... ’’
सबके चेहरों पर मुस्कान आयी-गयी।
उग्र उठने लगे। प्रसाद ने टोंका, ‘‘ कहां? अभी कुछ देर और बैठिये मित्र...! ’’
उग्र ने शातिर विनम्रता दर्शायी, ‘‘ ...ज्ञान की भारी-भरकम खुराक ले ही ली है... अब जरा चल-टहलकर इसे पचाने का प्रयास भी तो होना चाहिए! ’’
आचार्य शुक्ल नहीं चूके, ‘‘ हां! क्यों नहीं! इसे जितनी जल्दी हो चल-टहलकर पचा डालिये और हो सके तो बाहर भी निकालकर हल्का हो लीजिये!... ’’
फिर जोरदार ठहाका। थक्का-थक्का जमे मौन और गाम्भीर्य एक साथ जैसे भूसे की तरह उड़ने लगे! आचार्य शुक्ल आगे बोलते चले गये, ‘‘... ठीक समझ रहे हैं... सचमुच बहुत परेशान करने वाली चीज है यह अभागा ज्ञान! ... इससे जितनी जल्दी मुक्ति मिल जाये, आप जैसे बिकाऊ पुस्तकों के प्रणेता के लिए निस्संदेह यह उतना ही ज्यादा सुविधाजनक होगा और शुभ-लाभ-दायक भी... ’’ हंसते-हंसते सभी दोहरे होने लगे।
चौवालीस
जयशंकर के झमक-झंकृत मन-प्राणों पर टापुर-टुुपुर फुहारें अचानक टुपटुपाने लगीं। शीतल सुख-सिहरन। लगा कि अभी-अभी ऐसा कुछ अवश्य गतिमान हो उठा है जो विरल आनन्द की सृष्टि कर रहा है! अथक, अबाध। चमकते कोमल धागों वाली एक ऐसी बारीक सुई चलने लगी है जिसकी हर छुअन चुभ-चुभ टांकती-सिरजती चल रही है अनन्य सुखानुभूति। रोम-रोम में राग की आग और आलाप की ऊश्मा सींचती हुई। इस महीन सिलाई से स्पंदित अनुभूतियों के रंग-रस-गंध से भरे कई-कई बंध आकार ले रहे हैं। पुष्पबाण जैसा ठनकता हवा का धारदार उन्माद, धतूरे के फूलों जैसे हिल रहे घोड़े के कानों का अकुण्ठ प्रकम्पन, आंधी-सी भनभनाती बग्घी की लय-तालबद्ध चाल-छंद, बगल में बैठी श्यामा के काव्य -खंचित नेत्रों का मौन-मथित वसंत-राग और मन में मचा गरज-चमक वाला टटका झमाझम सावन... सभी जैसे एकसार सिलते और आत्मा-पृष्ठ पर मखमल-से बिछते चले जा रहे हों। सामने क्रमशः बड़ा होता हुआ खिसकता निकट आता सारनाथ का गगनमग्न बौद्ध स्तम्भ। इसके समानांतर मन में उमगती तरंगित ऐसी ही ऊंचाई। उन्होंने जरा-सा मुड़कर देखा। श्यामा का गोल मुखमंडल भाव-भासित। पतले होठों पर टकराते तृप्ति व प्यास के दोनों रंग। आंखों के पास हिलते घुंघराले बाल। कड़क पुरुष पोशाक में भड़कता कोमल स्त्री-लावण्य। जैसे लपलपाती लपटों पर जल-बूंदों की फफाहट! सारथि बना बैठा चेखुरा गति-नियंत्रण में जुट गया तो मन की रफ्तार अकस्मात् बेकाबू हो उठी। मन के वन में बवंडर। फिर वही द्वंद्व! बला की इस सुन्दरी का इस तरह जीवन में घुलते-मिलते जाना कहां तक उचित है! इसके प्रति भाभीश्री का अनन्त क्रोध! घर में रोज की किचकिच। क्या करें, कैसे करें! मन को मारें या परिस्थितियों को पराजित करने में जुटें! फिर बाला पर दृष्टि चली गयी, पल भर में मन से लेकर आत्मा तक बिछ जाने वाली झंकार! कहीं ऐसा न हो कि इस सुन्दरी के चलते घर में लगातार असुन्दर स्थितियां ही बनती चलें! विलोम का घात तो निसर्ग का विसर्ग है! शोर के पीछे ही आंखें काढ़े बैठी रहती है चुप्पी! प्रकाश की पीठ पर अखण्ड अक्खड़ अंधकार। सुख के पार्श्व तल से सटा जो बैठा होता है घात लगाये, वह दुर्भावनाग्रस्त दुःख ही तो है!
स्मृति क्षितिज जगमगाया। सौन्दर्य की वह अपूर्व पातालतोड़-गगनभेदी कौंध! तब कहां थी उसके आस-पास कोई असुन्दर छाया-प्रच्छाया? कितना अकृत्रिम-अकुण्ठ था वह प्रेमोन्मेश! कौंध गयी वह शाम... बल्कि श्यामा संध्या! 
‘‘...ऐ बाबूऽ! तन्नी गेटवा खोल्लाऽ! ’’ खनकती खिलखिलाहटों के बीच शब्द बजे थे घुंघरुओं की तरह। सबने चौंककर ताका। व्यग्र जिज्ञासा, घंटाध्वनि की अनुगूंज जैसी। शिवाले की हरियाली सजावट के काम में जुटे किशोरों-युवकों की आंखें भी चमक उठीं। नीचे वाले तो संयमित रहे किंतु बांस की सीढ़ी के सहारे दीवार पर टंगा युवक इतना उग्र जिज्ञासु हो उठा कि उसके हाथ से झण्डियों वाली रस्सी छूट गयी, इसका उसे जरा भी पता नहीं चल सका। लाल, पीले, हरे और नीले कागज की तिकोनी झण्डियों की लरजती कतार हवा पर तैरती नीचे उतरने लगी। वह वहीं से सिर पीछे की ओर मोड़कर गेट की ओर ताकता रहा। भाभीश्री के औचक निरीक्षण के बाद घंटा भर से छायी उदासी और मुर्दनी पल भर में हवा। रुनझुनी धवल हंसी हवा पर झरती रही, धुनी हुई बर्फ के फाहों की तरह। गेट से फिर वही मधुर पुकार! जगमोहन ;शिवाले की बारादरीद्ध से उतरकर शामियाने की ओर आते जयशंकर प्रसाद ने मुस्कुराकर चेखुरा को संकेत दिया तो वह दौड़कर गेट की ओर भागा। फुरफुराते- फुटफुटाते मित्रों के बीच बैठे व्यास हंसे,‘‘...लग रहा है, रजवंती की वसंती सेना आ गयी है! ’’
ठहाका। केशव प्रसाद मिश्र ने चुटकी ली, ‘‘..मजे की बात तो यह कि वसंती सेना के इस आक्रमण से पहले ही प्रसाद जी की वासंती योजना चारों खाने चित हो चुकी है! ’’
रामचंद्र शुक्ल और रायकृष्ण दास ने एक साथ कुछ यों ताका कि प्रसाद संकोच से भर उठे। मिश्र मुखातिब हुए व्यास की ओर, ‘‘ भाभीश्री का संदेह यदि आप पर है, तो यह पूरी तरह निराधार तो होगा नहीं... मुझे भी लग रहा है, आप ही प्रसाद जी को बिगाड़ रहे हैं... नाच-गाने का रसिक बनाकर छोड़ दिया है! ’’  व्यास कसमसाते रहे किंतु उनकी वक्रोक्ति जारी रही, ‘‘ तभी तो इस बार ‘वसन्तोत्सव’ पर उन्होंने आप पर ही निगरानी रखी और ऐन मौके पर आकर बरज दिया कि शिवाले में पूजा-पाठ तो होगा लेकिन शामियाने में नाच-गाने का कार्यक्रम नहीं!...लेकिन, चलिये गनीमत यही कि उन्होंने नाच तो रूकवाया लेकिन आपलोगों के कष्ट को भी एकदम अनदेखा नहीं कर दिया... गौनहारिनों वाला यह बढ़िया वैकल्पिक प्रबंध भी दे ही दिया ...आनन्द का झोंका आंगन से उड़कर बाहर ही तो आयेगा! ...लेकिन पण्डित व्यास, प्रसाद जी को बिगाड़ने वालों में आप चिह्नित हो चुके!’’
व्यास झंुझलाये, ‘‘...प्रसाद जी सखा-मित्र आपलोगों के होंगे, मेरे तो साक्षात् गुरु हैं!..’’
मिश्र ने बारी-बारी से शुक्ल व प्रसाद की ओर देखा और व्यास की ओर मुड़ गये, ‘‘ ऐसा नहीं है पंडित व्यास! सफल गुरु तो वही होगा जो कुशल घंटाल हो!...’’ शुक्ल भीतर से छिलकर रह गये। दर्द मन में ही उमड़ता-मंडराता रहा। इसके महीन संकेत चेहरे पर ऐंठती रेखाओं में उभरे बगैर नहीं रह सके। उन्होंने अपनी बात जारी रखी, ‘‘ प्रसाद जी कवि तो पूरजोर हैं किंतु दूसरे मामले में निःसंदेह थोड़े कमजोर! ...दरअसल इनके कठोर चट्टानी सीने के भीतर कविता का मीठा अजस्र स्रोत जो जीवित है... इसीलिए यह सखा तो पक्के हैं और मजे की बात यह कि यह सबके सखा हैं... जो जीव-जन्तु इनकी ही जड़ खोदने में जुटे हुए हैं उनके प्रति भी वैसे ही सदय और उदार... इस बात का साक्षी तो मैं स्वयं हूं! ’’
शुक्ल बैठे-बैठे पृथ्वी की तरह डोले, ‘‘सबके सखा यानी सनातन सखा! तब तो यह भी मान लेना चाहिए कि प्रसाद जी सचमुच ऋतुराज के भी सखा ही होंगे, यानी वसन्त-सखा!...’’
व्यास मुंह ताकते रहे। मिश्र ने जोर से ठहाका लगाया। प्रसाद बगलें झांकने लगे। शुक्ल ने मिश्र की ओर गम्भीर दृष्टि उठायी, ‘‘ क्यों भई केशव जी, मैंने अपनी ओर से कोई आरोप नहीं लगाया ...आपके दावे से ही निकलने वाली बात सरल रूप में सामने रख दी है...’’
मिश्र ने चुटकी ली, ‘‘ लगता है व्यासजी ने बात सुनी नहीं, अन्यथा गुरु की बात पर...’’
व्यास ने हाथ जोड़ लिये, ‘‘...सब समझ रहा हूं भई! वसन्त-सखा यानी कामदेव! ..जब टिप्पणी करने और इसका निशाना बनने वाले, दोनों ही अभिभावक-श्रेणी के हों तो ऐसे में बीच में मेरे बोलने की गुंजाइश कहां बनती है ? ’’
शुक्ल यों मुस्कुराये गोया बतकुच्चन को ही निगल गये हों, ‘‘ चलिये! हुआ! ...इस बार यह रंग भी देखा जाये कि गौनहारिनों के कंठ से ऋतुराज का कैसा अभिसार होता है! ’’
पैंतालीस
सामने आकर रूक गयी है गौनहारिनों की टोली। खुसुर-फुसुर, खुसुर-फुसुर और रह- रहकर मीठी-मधुर मुस्कुराहटें-खिलखिलाहटें। रुनझुन-रुनझुन हंसी। वे आठ हैं। घर-आंगन की स्त्रियों जैसी ही। साधारण किंतु साफ-सुथरे कपड़े। धीरता-गम्भीरता और सलज्जता। सम्पूर्ण गरिमामयी उपस्थिति। एक के कंधे से लटक रहा था हारमोनियम और दूसरी के गले में ढोलक। व्यास खड़े हो गये और जल्दी-जल्दी हाथ से उधर जाने का संकेत करने लगे, ‘‘ यहां नहीं! ..तुमलोग यहां मत रूको! ..बवाल मत करवाओ! जाओ.. उधर... सीधे आंगन में...! ’’
सबसे आगे है रजवंती। तीखे नैन-नक्श, स्वर में धातुई खनक। आवेग से भर एक डग आगे आ गयी, ‘‘ काहे सीधे आंगने में चले जायें ? सुंघनी साव के यहां आये हैं तो बाबू साहब को बिना सलाम बजाये आगे कैसे बढ़ जायें ? ’’ व्यास झेंप गये। रजवंती ने हाथ जोड़ लिये। उसके पीछे से सबने एक साथ कहा, ‘‘नमस्ते!’’ जैसे, टोकरी भर पायलें एक साथ छमकी हों- छम्म्म्! प्रसाद ने हाथ जोड़ कर विनम्रता से सिर झुका लिया। रजवंती पीछे मुड़ी और श्यामा का हाथ पकड़ सामने खींच लिया, ‘‘ बाबू साहब, आपको इसका परिचय दे दें... यह हमारी नयी सदस्या है... पढ़ी-लिखी है... कविता करती है... कंठ कोयलिया का पाया है! ’’
प्रसाद ने नजरें उठायी। सामने श्यामा। तन्वंगी कच्ची काया, जैसे गम्भीर नील विस्तार से उछलकर हवा पर ठिठकी हुई हो कोई चंचल फेनिल लहर! तृप्त-तरल भावों से भरी व विरल काव्य से अंजित बड़ी-बड़ी बोलती-सी सरल-सान्द्र आंखें। दृष्टि में आनन्द-वृष्टि का मृदुल गीत और सृष्टि का सृजन-संगीत। अथाह मन को समेट-बांध लेने वाले रेशमी जाल जैसे बाल। सांवलेपन पर चमकती सलोनेपन की धार।
शुक्ल और मिश्र चुप। व्यास के तेवर चढ़ गये, ‘‘..क्या कहा? ...यह नयी है? ...तुम यह सफेद झूठ ही नहीं बोल रही ? अभी उसी दिन तो देखा था इसे... मानमंदिर के पास तुम इसे लेकर मेरे घर नहीं आयी थी ? मेरी दादी ने इसे ही तो सराहते हुए गले लगा लिया था! ’’
रजवंती ने दोनों हाथ हवा में लहराये। मुक्का बांध उलटकर अपनी कमर पर कुछ यों रख लिया गोया अब जमकर वाग्युद्ध करने वाली हो, ‘‘ हम झूठ काहे बोलेंगे ? यह नयी तो है ही... यहां पहला कदम रख रही है... आपके घर पांव रख देने से ही कोई पुराना हो गया क्या?’’
‘‘ खैर, तुमलोग अब यहां से भागो... जाओ... भीतर जाओ...’’ व्यास ने सिर झटकारा।
प्रसाद और श्यामा की दृष्टियां युग्मद्ध! आंखें चार, किंतु दृष्टि जैसे एकसार। तरल प्रकाश-तरंगों का जैसे वेगवान प्रवाह। भाव-संवाद, समवेत-सघन। जैसे, यहां से वहां तक तनी मलमल की कोई पट्टी हवा के होठों पर लिख रही हो चमकती हुई गुनगुनाहट! रजवंती ने जल्दी से श्यामा को सामने से खींच पीछे की ओर धकेल दिया। वह झटका खाकर गिरते-गिरते सम्भली किंतु दृष्टि-प्रवाह जरा भी बाधित नहीं। सभी हक्का-बक्का। खिलखिलाहटें चांदनी-सी गुम। रजवंती की आंखों में चिनगारी। उसने श्यामा को केहुनी से धक्का मार फिर पीछे धकेल दिया। दृष्टि-प्रवाह चरमराकर टूट गया। वह लड़खड़ायी। पीड़ा का अहसास हवा पर भी उतर आया। आंगन की ओर बढ़ते हुए नीलोफर और शांता ने अगल-बगल से उसके हाथ पकड़ लिये। चुप्पी गूंज उठी।

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About Shyam Bihari Shyamal

Chief Sub-Editor at Dainik Jagaran, Poet, the writer of Agnipurush and Dhapel.
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7 comments:

  1. आदरणीय श्री श्याम जी आपकी लेखनी सशक्त और ऊर्जावान है ,साहित्यिक लेख ज्ञानवर्धक और कथाएं रोचक हैं | शुभकामनाएं और बधाई !
    -अभिनव अरुण
    लेखक - मीडिया कर्मी

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  2. प्रसाद जी मेरे भी पसंदीदा साहित्यकार रहे हैं | उनकी ध्रुवस्वामिनी हमारे कोर्स में थी | बाद में कई नाटक और उपन्यास तथा कहानियाँ पढीं उनकी | उनकी हिंदी उनके मानवीय भावों की अभिव्यक्ति का ढंग और मार्मिकता प्रसाद को भीड़ से अलग और उत्कृष्ट बनाती है |
    उनके जीवन और समय पर लेखन हेतु श्यामल जी को साधुवाद !

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  3. श्याम जी,
    साहित्यिक लेख प्रस्तुत करने के लिये बहुत - बहुत धन्यवाद्

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  4. सुन्दर आलेख ,प्रसाद जी के जीवन सन्दर्भ से !
    प्रसंशनीय !

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  5. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति ......!!

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  6. सद्भावनाओं के लिए आभार बंधुवर मिसिर जी, दिनेश मिश्र जी और शिवकुमार जी...

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