KANTHA (Jai shankar prasad k jivan par aadharit) upanyas ka 9th ansh : NAVNEET : FEB 2011 : Dhravahik prakashan zari

गन्ने के हिलते हरे-छरहरे धारदार पत्तों जैसी हवा, झरझराती हुई। उदग्र और उत्फुल्ल। प्रखर काव्यानुभूतियों की तरह। लहराती षीतलता तन से मन तक तरंगित। जैसे कोई भीगा फड़फड़ाता वस्त्र देह पर झपट-लिपट रहा हो। प्रसाद चौक की ओर बढ़ने लगे तो लगा जैसे वे नारियल बाजार की गली से निकलकर मुख्य सड़क की ओर नहीं, बल्कि घाट की सीढ़ियां उतरते हुए गंगा की ओर पहुंच रहे हों! झकोरते झोंकों की आवेग से अंटी वही झरझराती हुई धार, वही ताजगी। कुछ यों जैसे गंगधार जीवंत पवन-प्रवाह बनकर वायु-पटल पर रेल-रेल खेल रही हो! पूरा वातावरण तृप्ति-जल से छलछल, आप्यायित। सड़क पर सामने से आते व्यास दिख गये। उनके अभिवादन पर प्रसाद खिल गये। दोनों साथ-साथ नागरी प्रचारिणी सभा की ओर ही बढ़ चले।
डग पर डग भरती हुई चुप्पी। व्यास ने महसूस किया, प्रसाद कुछ अधिक चिंतानिमग्न खोये -खोये-से डग बढ़ा रहे थे। साथ-साथ चुप्पी भी तनी चलती रही। उनकी इस मनोदषा के बारे में तरह-तरह के प्रष्नों से जूझते व्यास चुप्पी बरतते चलते रहे। मौन जैसे प्रसाद को वहां से अनुपस्थित बनाये चल रहा था।
चलते-चलते एक बात दिमाग में आयी लेकिन व्यास ने सप्रयास स्वयं को सम्भाल लिया। उन्होंने अपनी आदत के विपरीत तपाक से मुंह नहीं खोला। संयम के साथ पहले  ठीक से विचार किया। ऐसे में यह तो महसूस होने लगा कि चूंकि उल्लेख्य संदर्भ विदेषी साहित्य से जुड़ता है, लिहाजा ऐसे अवसर पर मिलने वाली पारम्परिक झिड़की की एक खुराक मिलना तो है! हालांकि, इस विदेषी साहित्य-प्रेम को उन्होंने कभी निषाना तो नहीं बनाया किंतु चूंकि वे प्रसाद हैं लिहाजा उनके सोच हर बार प्रषस्त मुखमंडल पर साफ- साफ रेंगते हुए दिखते रहे हैं। उनकी यह चिंता भी अब तक छुपी नहीं रह सकी है कि अध्ययन-वृति तो उनसे ही ली गयी किंतु यह पष्चिमोनमुख जिज्ञासा कहां से गयी
 लगा कि उन्हें मौजूदा द्वंद्व से बाहर निकालने के लिए कोई तीखी चर्चा छेड़ी जा सकती है। सघन गाम्भीर्य के साथ बोले, ‘‘ गुरुजी, मुझे एक बात नहीं समझ में आती कि हमारे यहां के मनीशियों-सर्जकों और विदेषी महान लेखकों में चरित्र के सवाल पर इतना व्यापक अन्तर क्यों है... बल्कि सर्वथा विपरीत जीवन-सत्य देखने को मिलता है... ’’
प्रसाद ने पहले झटके से देखा फिर सामने ताकते बढ़ते रहे। दूसरे ही पल उन्होंने संजीदगी से दुबारा दृश्टि डाली और तुरंत हटा ली। दोनों के कदम बढ़ते रहे। व्यास आगे बोले, ‘‘ महान जर्मन कवि गेटे को ही देख लीजिये, उनके जीवनी लेखक का कहना है कि गेटे से सम्बन्ध रखने वाली औरतों का विवरण दिया जाने लगे तो इसमें ही एक पुस्तक के कई अध्याय खर्च हो जायेंगे! उसी तरह लियो टालस्टाय के जीवन पर नजर डालिये... कहां उनकी संतों वाली छवि और कहां उनके जीवन का मूल यथार्थ यह कि उनका आरम्भिक जीवन जुआ, षराब और औरतों के संसर्ग में ही बीता... बचपन में ही उन्होंने उम्र में स्वयं से बड़ी एक लड़की से सम्बन्ध जोड़ लिया... बाद में उसी की बेटी से षादी की... टालस्टाय को एक अन्य किसान औरत से एक जारज पुत्र हुआ था जिसे नौकर के रूप में परिवार के साथ रख लिया था... फ्रांस का अमर कवि फ्रांकोइस विलियन का चरित्र यह कि उसे हत्या चोरी आदि जैसे अपराध के आरोप में मृत्युदण्ड तक मिल चुका था किंतु इसके समानान्तर उसकी प्रतिभा इतनी प्रचण्ड कि अपनी कविता के बल पर ही उसे जेल से छुटकारा मिल गया... वह जीवन भर भटकता ही रह गया... ’’
सभा के परिसर में प्रवेष करने तक वे बोलते रहे। प्रसाद कृत्रिम सख्ती दिखाते बोले, ‘‘ पण्डित जी, अब आप अपने ज्ञान का पिटारा बन्द कर लीजिये... देखिये हमलोग सभा परिसर में प्रवेष कर चुके हैं... ’’  व्यास झेंप गए। जैसे कोई बच्चा षरारत करता रंगे हाथ पकड़ लिया गया हो।
प्रसाद की वाणी में रोश के कण चमकने लगे, ‘‘ मैं यह नहीं समझ पाता कि आप या आप जैसे कुछ साहित्यिक श्रद्धालु भला यह क्यों अपेक्षा पालने लगते है कि किसी भी लेखक या विद्वान का जीवन मर्यादा पुरुशोत्तम जैसा ही होना चाहिए! भई, लेखक कोई अवतारी आत्मा तो है नहीं... वह भी इसी जीवन-समुद्र की एक सामान्य आम खारा बून्द ही तो है...! वह सामान्य जीवन-धार में तैरकर ही तो सब तरह के अनुभवों को बटोरता है... यही अनुभव उसके साहित्य की जमीन बनाते हैं!... भई, जो व्यक्ति कभी किसी दुर्भाग्य से नहीं टकरायेगा वह भला सौभाग्य का स्वाद कैसे पहचान सकेगा?.. उसी तरह जिसको बुराई का स्पर्ष भी नहीं मिलेगा वह अच्छाई की षिनाख्त भला कैसे कर सकता है?...’’
व्यास बहुत सावधानी से जैसे उनके एक-एक षब्द को जज्ब करते रहे। प्रसाद आगे बोलते चले गए, ‘‘ ...जहां तक विदेषी महापुरुशों को लेकर तुम्हारी दुविधा का प्रष्न है, मेरी दृश्टि में इसका सबसे प्रमुख कारण वहां की अपेक्षया भौतिक सम्पन्नता हो सकती है... यहां मैं भौतिक षब्द को विषेश अर्थ में खोलना चाहूंगा... भूत से भौतिक... इसमें भूत यानी अतीत-व्यतीत जैसा कुछ नहीं बल्कि सीधे-सीधे प्रेत! इस तरह भौतिकता का यहां मतलब हुआ प्रेतता या प्रेतपन! दरअसल विदेषों की जो भौतिक सम्पन्नता से उत्पन्न मानसिकता है वही दुधारी तलवार है... संयम नैतिक अनुषासन के जरा भी कमजोर पड़ते ही यह भौतिक वाला भूत सिर पर चढ़ बैठता है... सिर पर चढ़ा भूत क्या-क्या कर सकता है अब यह तो तुम समझ सकते हो... इसलिए ऐसे में भौतिक-सम्पन्न विदेषों में जो कुछ हो सकता है, वही-वही सब होता चला गया है जिसे देखकर आपके या मेरे जैसे लोग यहां बनारस में इस तरह चिंतित हुए जा रहे हैं... ’’
आर्य भाशा पुस्तकालय के वाचनालय में पहुंचकर दोनों टेबुल के दो ओर आमने-सामने बैठ गये। दास सामने रखी पत्रिकाएं उलटने-पलटने लगे। प्रसाद ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘..समग्र जीवन से नाता जुड़ सके तो लेखक तो अधूरे अनुभवों का ही प्रस्तोता होकर रह जायेगा... आप यह कैसे भूल जाते हैं किराम चरित मानसमें श्रीराम के संघर्श का जो चित्रण पढ़कर आप कभी हर्श तो कभी विशाद से भर जाते हैं, वह भी और रावण का जो चित्रण देख-पढ़कर रोश घृणा से भर जाते हैं, यह भी... सारे चाक्षुश वृतांत आखिर इकलौते व्यक्ति महाकवि तुलसीदास ने ही चित्रित किए हैं! सीधा तात्पर्य यह कि ऐसे सारे दृष्य-अनुभव महाकवि ने लिपिबद्ध-काव्यबद्ध करने से पहले अपने भीतर दृष्यबद्ध किये होंगे... तभी तो वे इस तरह एक-एक प्रसंग को इस तरह जीवन्त साकार गढ़ सके!... यानि कि ऐसी सारी प्रिय-अप्रिय दृष्यावलियां प्रथमतः और अंततः उन्हीं के मानस की उत्पतियां ठहरीं...’’
व्यास ने चुप रहकर इस बात को फिलहाल यहीं दबा देना उपयोगी समझा। वे किसी पत्रिका में डूबकर मगन हो गए। तभी प्रसाद का ध्यान बगल में बैठे एक युवक पर गया और टिक-सा गया। उन्हें उसकी एकाग्रता ने आकर्शित किया। वह अब तक उनके एक-एक षब्द को जैसे कानों आंखों से पी रहा था! एकदम कोयले जैसा रंग, लेकिन नयन-नक्ष में रत्नों जैसी पानीदार धार। उसके लम्बे काले घुंघराले बाल जैसे उसकी अपनी ही देह के रंग से लोहा लेते दिखे। कपड़े साफ-सुथरे। देखने में निहायत ही जहीन। प्रसाद ने हल्की मुस्कान छोड़ी तो वह उठकर पास गया और चरण स्पर्ष करने लगा। उन्होंने उसे ऐसा करने से रोकने के लिए जोर से कहा, ‘‘ हंऽ.. हंऽ.. हंऽ...! मुझे कहां खोज रहे हो... मैं नीचे नहीं, तुम्हारे सामने हूं भई... मैं अपने पांव में नहीं निवास करता... ’’
उसने आवेगपूर्वक चरणस्पर्ष कर ही लिया। प्रसाद हंसे, ‘‘ पक्के निषानेबाज लगते हो... ’’
व्यास ने बहुत प्रयास करके अपनी हंसी रोकी। वह अपनी जगह लौटकर बैठ गया और सामने खुले अखबार के पन्नों पर पूर्ववत् नजर गड़ा ली। प्रसाद ने व्यास की ओर देखा मुस्कुरा दिए। दरवाजे पर षब्द हुआ। दोनों की निगाह एक साथ उठ गयी, जगमोहन वर्मा थे!
नजर मिलते ही उन्होंने वहीं तेज आवाज लगायी, ‘‘...वाह! गुरुजी, पधार गये हैं! ..अभिवादन कर रहा हूं... कितने दिनों बाद दिखे हैं आप! मैंने तो समझा कि आप इधर का रास्ता ही भूल चुके हैं...’’ बोलते हुए वे पास गये, ‘‘ मेरा अभिवादन स्वीकार कर रहे हैं !... ’’
प्रसाद बहुत भेदक दृश्टि से ताकते रहे, ‘‘ वाह भई वर्मा जी! मान गये... यानी कि आप भाशा- विज्ञानी ही नहीं, झांसा-विज्ञानी भी हैं! बहुत खूब! ... ’’
वर्मा इनकार में जोर-जोर से सिर हिलाते हुए सामने गये। ससम्मान झुककर उनके आगे बढ़े हाथ को थाम लिया, ‘‘ हमसे कोई भूल हो गयी है क्या... ’’
‘‘ भूल नहीं हुई, आपने प्रणाम की नयी षैली का नायाब फूल ही खिला दिया है’’
‘‘ आंऽय! ..क्..कैसे ? ’’
‘‘ एक तो दूर से प्रणाम कर दिया! ’’
वे ठठाकर हंस पड़े। अपने कान स्वयं ही मरोड़ने लगे, ‘‘ ऐसा कैसे हो सकता है! आप दूर हो ही कैसे सकते हैं... आपका वास तो हमारे हृदय प्रांत में है... ’’
‘‘ समस्या पर समस्या खड़ी करते चले जाइये... पहले वाले मामले को तो रेखांकित कर लूं... हां, तो दूर से नमस्कार और पास आकर स्वीकार का तगादा! ’’
वे उसी तरह हंसते-हंसते अपने कान खुद ऐंठते रहे। व्यास समेत आसपास के सभी लोग हंसते- हंसते लोटपोट। प्रसाद आंखें फैला-फैलाकर सिर गोल-गोल घुमाते रहे, ‘‘ आप जिस तरह एक साथ वैदिक भाशा संस्कृत से लेकर फारसी तक में तैरने वाले ज्ञानप्रेत हैं, आपकी कोई भी क्रिया-प्रक्रिया अनर्गल या आकस्मिक कैसे हो सकती है... आप एक-एक दांव को कई-कई धरातलों पर तौलकर तब कदम बढ़ाते होंगे... ’’
वर्मा सफाई देने लगे, ‘‘ नहीं, नहीं! मान्यवर, ऐसा कत्तई नहीं है और कभी ऐसा होता भी नहीं है... डाक्टर स्वयं का इलाज कभी कर पाता है क्या! माली सुन्दर-सुन्दर फूल तो खिला देता है किंतु खुद के चेहरे को मुरझाने से नहीं बचा पाता! भाशा विज्ञानी की लिखी कोई कविता-कहानी कभी ध्यान से देखियेगा, सबसे षुश्क वही मिलेगी.. जो खाद पौधों में बड़े-बड़े सुस्वादु फल लाद देता है, उसका अपना स्वाद बहुत खराब होता है... गन्ध तक सर्वथा असह्य! ’’
प्रसाद खड़े हो गये। व्यास भी। तीनों वाचन प्रभाग से उठकर मुख्य सम्भाग की ओर बढ़ चले।
पुस्तकालयाध्यक्ष की कुर्सी खाली थी। अगल बगल की कुर्सियां भी। मुख्य कुर्सी छोड़कर तीनों बैठ गये। प्रसाद ने पूछा, ‘‘ सभा का संकल्प कब पूरा होने जा रहा है ?’’
‘‘ संकल्प! कौन-सा संकल्प ? ’’
‘‘ अरे भैये, वही जिसमें आपलोग जी-जान से जुटे हुए हैं...‘हिन्दी षब्दसागरवाला काम...’’
‘‘ सागर तो सागर है... कोई गागर तो है नहीं कि एक बार जरा-सा टेढ़ा करके डुबोया और पूरा भरकर निकाल लिया... ’’ बोलते हुए जैसे अचानक उन्हें कोई विषेश बात स्मरण हो आयी हो। अतिरिक्त सजग हुए और थोड़ा चौंकते हुए घुंघराले बाल वाले युवक की ओर मुड़कर उसे हांक लगाने लगे, ‘‘ अरे बच्चा! , बच्चा... सुनो, इधर आओ! ’’
प्रसाद समझ गये। उन्हें रोकने लगे, ‘‘ उसे क्यों बाधा पहुंचा रहे हैं... देख नहीं रहे कि वह बेचारा कैसा अध्ययन में लीन है! एकदम चौचक... ’’
लड़का सामने गया था। वर्मा ने उसे प्रसाद जी का अभिवादन करने का संकेत किया। वह चुपचाप उनका मुंह ताकता रहा। प्रसाद मुस्कुराये, ‘‘ अरे, इसे वहीं जाकर पढ़ने क्यों नहीं देते... इसकी गति-मति बहुत तेज है... यह मेरे ही पांवों में मुझे तलाषने का सफल-असफल प्रयास कर चुका है! ’’
संकेत पाकर वह पूर्ववत् अपने स्थान पर लौट गया। पूर्ववत् पन्ने पलटने लगा।
वर्मा मध्यम स्वर में बताने लगे, ‘‘ परसों की ही बात है... यहीं यह मिल गया... रात में जब पुस्तकालय बन्द होने लगा तो वह पाठक जी से अनुरोध करने लगा कि उसे रात में यहीं कमरे में रहने दिया जाए और बाहर से ताला-वाला भी लगा दें क्योंकि वह रात भर पढ़ना चाहता है...! पाठक जी उस पर बिगड़ रहे थे... मुझे जब यह बात समझ में आयी तो मैं चौंक गया... बताइये भला कोई युवक ऐसा हो जो रात भर पढ़ने के लिए खुद को पुस्तकालय में बन्द करने का आग्रह कर रहा हो... मैंने उससे हल्की पूछताछ की और अपने साथ घर ले गया... वहां वह सचमुच रात भर पढ़ता रहा। सुबह मैंने जांचा भी रात की पढ़ी चीजें सब जैसे उसके कंठ पर ही रखी हुई हों... अद्भुत सम्भावनाओं से भरा हुआ युवक है यह... ‘‘
‘‘ यह है कौन ? ’’
‘‘ कुछ बता नहीं रहा... ’’
‘‘ अरे! तब तो यह बात ठीक नहीं! कुछ तो बताये कि कौन है, कहां से आया... अचानक यहीं क्यों प्रकट हो गया... धरती चीरकर निकला है या आसमान से टपका है ? कुछ तो बता रहा होगा... ’’
चल रही बातचीत का संकेत उसे सम्भ्वतः मिलने लगा। वह वहीं से बार-बार इधर नजर उठा लेता। इसे लक्ष्य कर वर्मा ने प्रसाद को बाहर चलने का इषारा दिया। दोनों उठे तो सामने से पाठक जी आते दिख गये। प्रसाद जी ने मुख्य कुर्सी की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘‘ आइये, आइये अंगराज! आपके सिंहासन की ही तो हमलोग रखवाली करते रहे अब तक! कहां अंतर्धान हो गये थे... ? ’’
प्रसाद के मुख सेअंगराजसंबोधन पर वे पूर्ववत् पुलकित। हमेषा की तरह कान की मषीन टटोलते हुए उन्होंने बैठने का आग्रह किया। प्रसाद ने बाहर का संकेत किया, ‘‘ हमलोग कहीं जा नहीं रहे... बस, बाहर जरा टहल ले रहे हैं... ’’
दोनों बाहर गये। वर्मा ने बात फिर षुरू की, ‘‘ निराश्रित लग रहा है... बहुत पूछने पर भी स्वयं के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता रहा... हो सकता है किसी बात पर चोट खाकर घर-बार छोड़ पलायन कर गया हो... लड़का जहीन लगा, ऐसे लोग भावुक होते ही हैं... इसीलिए मैंने इसे आश्रय देना ठीक समझा... ’’
प्रसाद संजीदगी से उनका मुंह ताकते रहे। वर्मा ने अपनी षंका छलकायी, ‘‘...उसे आश्रय देकर मैंने कोई गलती तो नहीं की? ... ’’
‘‘ नहीं, कत्तई नहीं! किसी भी निराश्रित को आश्रय देना किसी भी दृश्टि से गलत नहीं... हां, अब अगर वह आने वाले समय में कोई घात करता है तो यह आपकी नहीं उसकी गलती मानी जायेगी... ऐसी स्थिति में तब भविश्य में कोई यह प्रष्न उठा सकता है कि आश्रय देने से पहले आपने उसकी ठीक से जांच-पड़ताल क्यों नहीं करा ली थी!...’’
‘‘ आंऽ ! ऐसा भी हो सकता है? वह घात भी कर सकता है ? ... ’’
‘‘ क्यों नहीं! हो तो कुछ भी सकता है..  एक बात तो आप भी मानेंगे कि ...इस संसार की बनावट ही ऐसी है कि यहां कभी भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है, उसी तरह मनुश्य का मन ऐसा रचा गया है कि वह कभी भी कुछ भी कह-कर सकता है... ’’ प्रसाद की व्यंग्य मुद्रा को वे सचमुच नहीं लख पा रहे थे।
‘‘ आंऽ ! ऐसा! ... ’’ बढ़ती हुई घबराहट।
‘‘...लेकिन जब भविश्य में आपसे यह पूछा जायेगा कि आपने रखने से पहले इसकी जांच- पड़ताल क्यों नहीं कर-करा ली थी तो उस समय भी आपके हाथ में यह जवाब सुरक्षित बचा होगा...’’
‘‘ क्-क्... क्या ? ’’
‘‘ यही कह दीजियेगा कि यह लड़का जांच में सहयोग करने को तैयार नहीं हुआ और मेरा मन उसे आश्रय देने पर राजी नहीं हुआ! बस, और क्या! ’’ कहकर प्रसाद हंसने लगे। वर्मा पहले अचकचाये फिर साथ देने लगे।
प्रसाद ने फिर संजीदा होते हुए कहा, ‘‘ ... एक बात है...  यह लड़का लगता तो बहुत सम्भावनाषील है... लेकिन साथ ही इससे नाना प्रकार के रहस्य फूटने की भी अपार सम्भावनाएं झिलमिला रही हैं... क्या नाम है इसका? ’’
‘‘ नाम तो जगतनन्द बताया है... ’’
‘‘ अरे, ऐसा नहीं! आप ठीक समझ रहे हैं यह उसने केवल बता भर दिया होगा, असल में यह उसका नाम होगा नहीं! ... ऐसे मेधावी का ऐसा घिसा-पिसा नाम ठीक भी नहीं! एक काम आप यह क्यों नहीं करते!... ’’
‘‘ क्या, बतायें...! ’’
‘‘ उसका एक नया नाम तो आप रख ही सकते हैं... ’’
‘‘ आप ही कोई उचित नाम सुझा दीजिये ! ... ’’
‘‘ हां, ठीक कहा... उचित नाम! ... मेरी दृश्टि में तो उसके लिए एक ही नाम उपयुक्त होगा... अच्छा है कि इकलौता सूझा भी है... चुनने में कोई दुविधा नहीं रहेगी...’’
‘‘ क्या... बताइये तो! ... ’’
‘‘ आबनूस का कुन्दा! ’’
वर्मा बहुत ध्यान से उनका मुंह ताकते रहे। प्रसाद ने पूछा, ‘‘ क्यों! यह नाम आपको पसन्द आया या नहीं ? वैसे आप अगर मुझे कोई दूसरा नाम तलाषने को कहेंगे तो आगे मैं अब असमर्थता ही व्यक्त कर सकता हू... क्योंकि उसके नाम के लिए मेरी दृश्टि में कोर्इ्र दूसरी संज्ञा है ही नहीं! ’’
 दोनों भीतर लौटे तो पाठक टेबुल पर अधखुले अंगोछे पर चबेना खोले व्यग्र प्रतीक्षारत मिले। पास पहुंचते ही उन्होंने कहा, ‘‘ अरे, महाकवि! बाहर कहां विचर रहे हैं! यहां यह गरीब ब्राह्मण सुदामा कब से प्रतीक्षारत है... ’’
प्रसाद ने भर मुट्ठी दाना उठा लिया और खड़े-खड़े एक फांका मारा। वे मसर-मसर चबाने लगे। मुंह खाली हुआ तो बोले, ‘‘ चबेनत्व में सुदामत्व का भले कोई द्वापरकालीन रागत्व षेश हो... पाठक जी, आप एक बात दिमाग में आज साफ कर लीजिये कि चबेनत्व से ब्राह्मणत्व का कोई टेढ़ा-सीधा सम्बन्ध नहीं बनता! जरा भी नहीं! ...’’
पाठक मुंह ताकते चले जा रहे थे। प्रसाद ने फिर मुट्ठी भर ली और फांकने से पहले तेज स्वर में बोल पड़े, ‘‘...क्योंकि ब्राह्मणत्व एक षाष्वत बुद्धि-वैभव है! ’’
सुनकर चमत्कृत हो गये पाठक। गदगद होकर बोले, ‘‘ वाह, महाकवि! बड़ा मौलिक पैमाना गढ़ दिया! भई वाह! ...मान गये! ...आपने ऐसा षातिर दांव चल दिया है कि हम तमाम ब्राह्मण एक धक्के के बाद धड़ाम्-से अब्राह्मण हो गये और सिक्के की तरह षब्द-षब्द जोड़ने वाले बुद्धि-वैभवषाली बनिये एक छलांग में मुनि वषिश्ट! ’’
व्यास बगल में बैठे किसी किताब में डूबे हैं। प्रसाद ने उनकी ओर ध्यान जाते ही कहा, ‘‘ सचमुच... यह पट्ठा है कुछ अलग और विषेश! बड़ा जबरदस्त अध्ययन-अभियान चला रहा है ! देखिये, हमलोग यहां किताबों के बीच आकर भी वंचित रहे और बकबकाते रह गये... इन्होंने यह किताब पकड़ी और अब तक आधी कर ली... भई वाह! ... ’’
‘‘ मैंने तो यह अदना पुस्तक भर आधी पढ़ी है, आपने तो गुरुजी, एक-एक वाक्य में पूरा-पूरा ग्रन्थाधार ही गढ़कर हवा में उछाल दिया है... नाहक मैं इस वाचन-जाल में फंसा रहा...आपके श्रीमुख से निकलती बातें पकड़ता रहता तो सचमुच मुझे लिखने का कई महीने का मसाला मिल गया होता! ’’
रायकृश्ण दास के आते ही कहकहे बढ़ गये। पाठक ने कहा, ‘‘हिन्दी वाले इन दिनों आपस में जैसी उखाड़-पछाड़ में जुटे हैं इससे सचमुच बड़ी चिन्ता हो रही है... ’’
प्रसाद चुप सुनते रहे। रायकृश्ण दास ने पाठक से कहा,‘‘...साहित्य जब जीवित- जाग्रत है, वर्द्धन-परिवर्द्धनषील है तो उसमें उखाड़-पछाड़ तो चलती ही रहेगी ! ... जीव अगर जिन्दा है तो गन्दगी विसर्जित करेगा ही करेगा... यह क्रिया बन्द होने का सीधा अर्थ होगा मौत! ’’
सभी उनका मुंह ताकने लगे। दास आगे बोले, ‘‘ क्यों भई, आप ही बताइये इस इतने बड़े भाशा के आंगन में आज कोई रवीन्द्रनाथ टैगोर कहीं दिखता है !’’
पाठक खड़े हो गये और बहुत श्रद्धा-सम्मान के साथ प्रसाद की ओर संकेत कर बोले, ‘‘ क्यों नहीं दिखता! यह खड़े तो हैं सामने! ’’
दास जैसे हक्का-बक्का रह गये हों। व्यास ने सहमति में तेज-तेज सिर हिलाया। प्रसाद बोले, ‘‘ जो बात समझ में कम आये उस पर जरुर सिर हिलाना चाहिए और जो एकदम सिर के ऊपर से निकल जाए उस पर तो विनोद जी की तरह एकदम इसी अंदाज में सिर-चक्रमण षुरू कर देना चाहिए...’’  सबके होंठों पर असंक्षिप्त मिठास खिल आयी। सुगन्ध से भरी और रागों से सजी!
उंतालीस
आर्यभाशा पुस्तकालय में केदारनाथ पाठक के सामने बैठने के दो लाभ हैं। एक, नागरी प्रचारिणी सभा में बहने वाली हवाओं का पूरा थाह-पता मिलना तय है! कोई हो, उनकी मीठी छुरी सब पर चल जाती है। रेषा-रेषा उधेड़कर समालोचना कर पूरा परिदृष्य सामने उपस्थित कर देते हैं! दूसरा, हिन्दी भाशा और साहित्य के लिए देष भर में कहां-क्या प्रयास हो रहा है, इसकी छोटी -से छोटी सूचनाएं भी हाजिर! ज्यादातर पुस्तकें या पत्रिकाएं तो वह आते-आते ही चाट चुके होते हैं! सामने बैठा व्यक्ति नयी से नयी पुस्तक या पत्रिका भी ज्यो ही हाथ उठाता है वे उसके बारे में स्वमेव धाराप्रवाह बोलने लग जाते हैं! इसमें क्या है, कैसा है, क्या नहीं है, क्यों नहीं है आदि-आदि सभी कोणों से कुछ कुछ ठोस टिप्पणी। इस क्रम में वह कब अमुक सम्पादक या रचनाकर की प्रषंसा में मुग्ध धाराएं बहाने लगेंगे या इसके विपरीत उसकी कसकर खबर लेने लगेंगे, कोई कुछ कह नहीं सकता। पीठ थपथपाना-पुचकारना या गरियाना-लतियाना, सब बनारसी ही अंदाज में। इस दौरान उनके अध्ययन और ज्ञान से निस्संदेह लाभ ही होता है! कुल मिलाकर उनकी बड़ी विषेशता यही कि पुस्तक-पत्रिकाओं के प्रति अद्भुत जिज्ञासु! पढ़ने के मामले में बेजोड़। अपने नाम को खास ढंग से सार्थक बनाने वाले। प्रसाद के षब्दों मेंकेदारनाथ पाठक यानि जबरदस्त पाठक’! इसीलिए प्रयास रहता है कि षाम में एक बार उनके साथ बैठकी अवष्य हो जाये। प्रसाद कभी दास तो कभी व्यास के साथ या नहीं तो अकेले ही सभा पहुंच ही जाते हैं।
उस दिन। प्रसाद गम्भीरपूर्वक उनसे मुखातिब ‘‘ पाठक जी आपके होते कोई किताब-पत्रिका खोलने की आवष्यकता ही नहीं रह जाती... क्यों बेमतलब आपके अध्ययन को चुनौती दी जाये! ’’
वे सकुचा गये। सिर नीचे कर रजिस्टर में कुछ लिखने लगे।
दास ने वाचकों में बैठे सांवले युवक की ओर संकेत किया। उसकी ओर दृश्टि पहुंचते ही प्रसाद ने सिर हिलाया, ‘‘ अच्छा, तो यहआबनूस का कुन्दाआज उधर जमा हुआ है! ’’
दास प्रष्नवाचक, ‘‘ आपने एक बात पर ध्यान दिया कि नहीं ? ’’
‘‘ क्या ? ’’
‘‘ यहआबनूस का कुन्दानवस्थानवादी है... प्रतिदिन एक नयी जगह पर बैठता है... ’’
‘‘ अच्छा! इस पर तो मैंने अब तक ध्यान ही नहीं दिया था... ठीक ही ध्यान दिलाया! यह तो सचमुच कभी अपनी पुरानी जगह पर दुबारा बैठा नहीं दिखता! ’’
‘‘ इसका तात्पर्य क्या निकाला जाये ? ’’
‘‘ वैसे, नवस्थानवादी विषेशण गलत नहीं लग रहा... किंतु थोड़ा दृश्टिपात करूं तो मुझे कहना पड़ेगा कि अगर यह रचनात्मक मस्तिश्क का हो तोप्रयोगधर्मीठहरता है अन्यथा यदि नकारात्मक हुआ तोधूर्Ÿ’! ’’ प्रसाद ने उसके व्यक्तित्व का विष्लेशण करते हुए आगे टिप्पणी की, ‘‘ वैसे जिस तन्मयता से पढ़ता दिखता है उस हिसाब से यह संजीदा लगता तो नहीं है! ’’
दास ने टेबुल पर रखामाधुरीका नया अंक ज्यों ही उठाया, पाठक की दृश्टि पड़ गयी। वे अपने अंदाज में षुरू हो गये, ‘‘ सरवा का नरक मचवले हौ!... लगता तो अब यही है कि दुलारेलाल भार्गव का नाम बदलकर दुत्कारेलाल भार्गव ही कर देना पड़ेगा! जो लेखक इनके जाल में नहीं फंस रहा उसके विरुद्ध तो ये महाषय डंडा लेकर ही पड़ जा रहे हैं... पत्रिका की षक्ति का सर्वथा दुरुपयोग चला रहे हैं! इसका विरोध करना होगा! चुप रहने से काम नहीं चलने वाला.. उन्हें यह तो महसूस करा ही देना होगा कि वे जो गोरखधंधा चला रहे हैं इसे समझा भी जा रहा है और नकारा भी जाने लगा है! ऐसा नहीं होने पर उनका गलत साहस बढ़ता ही जायेगा! ’’
वाचनालय के लोग सहज-परिचित भाव से मुस्कुरा-मुस्कुराकर बीच-बीच में इधर देख ले रहे हैं। पाठक बीच-बीच में अपने कान के श्रवण-यंत्र टटोल ले रहे। चर्चा चलती रही। वे लगातार धाराप्रवाह बोलते-बरसते हुए दोनों के चेहरों को अपनी लसलसी दृश्टि से रौंदते रहे।
अचानक दास तुनके, ‘‘ काऽ गुरु ! तोहार भाशणे चलीऽ कि कुछ मंगइबाऽ ? ’’
पाठक ने अपनी भावमुद्रा को बदले बगैर अपने सहयोगी को जल्दी से संक्षिप्त संकेत दे डाला। वह रोज की तरह इसी की प्रतीक्षा में ताकता भी रहा। अनुमति मिलते ही उड़ गया। पाठक एक बार और झझकते हुए षुरू हो गये। प्रसाद और दास बहुत एकाग्रता से सुनते रहे।
सहयोगी जब तक मटके में ठंडई लेकर लौटा तब तक पाठक भी ठंडे हो चुके। रोश-धारा का समापन उन्होंने अपने निर्धिारित नीति वाक्य से ही किया, ‘‘ चलिये, पत्रिका में नयी रचनाषीलता को कुछ स्थान तो मिल ही जा रहा है! ’’
उनके इस आदती उपदेष पर दास हर बार की तरह फिर बनावटी ढंग से तुनक गये ‘‘...अब येकरे आगे तूं कुछ मत बोलल कराऽ! इहैं बइठल-बइठल पिंगिल पढ़बाऽ अउर डंडा लेके कूदत रहबाऽ...! येसे कुछ होई? ’’
प्रसाद ने माहौल बदला, ‘‘ देखो भैये! ...दृश्टिकोण या टिप्पणीविषेश पर सहमत-असमत होना तो एक अलग बात है... लेकिन पाठक जी के बारे में मेरा तो बस यही कहना है कि सभा की गोद में यह जितना बड़ा पुस्तकालय विराजमान है, उतना ही बड़ा ज्ञानालय इनके मस्तिश्क के भीतर भी विद्यमान है! इन्हें तो अब प्रोन्नत करपुस्तकालयाध्यक्षसेपुस्तकालय-यक्षघोशित कर देना चाहिए! ...यह तो सचमुच पूरा पुस्तकालय ही घोंटकर पी चुके हैं! ’’
सामने ठंडई से लबालब पुरबे भी गये। दोहरी ठंडई! माहौल षीतलता से भर जाया। तैरती हुई मलाई से बात षुरू होई और ठंडई की अनूठी बनारसी रचना-षैली और आसपास के दूसरे जनपदों की तुलना में इसकी श्रेश्ठता-मौलिकता की चर्चा चल निकली। पान-Ÿाा चला। प्रसाद दास चलने को उठे। पाठक ने टोका, ‘‘ अरे यार, सड़किया पर तऽ जाके ओह तरफ पटरिया पर तूं लोग खड़े-खड़े घंटन बतिआवत रह जालाऽ... येह से अच्छा हौ कि इहैं बइठल रहाऽ ... अउर मनमाना गलचउर करत रहाऽ! हमरो चलहींके हौ... संगे निकलल जाई! ... ’’
दास ने जोर से इनकार में सिर हिलाया, ‘‘ अब हम सबके कुछ दोस्ताना-गलचउर भी करेबे देबाऽ कि तोहरे निंदा-प्रषंसा में इहैं झाल बजावत रह जाईंऽ?’’
प्रसाद चाहते हुए भी दास का हाथ नहीं छुड़ा सके। दोनों बाहर निकल आये।
पुस्तकालय बन्द कर पाठक कुछ ही देर बाद सभा परिसर से बाहर आये। गेट से थोड़ा ही आगे सड़क की पटरी पर प्रसाद और दास खड़े दिख गये। हंसते-बतियाते हुए। साइकिल पकड़े निकट आते हुए वे थोड़े तल्ख हो उठे, ‘‘ तूं लोग भी अजबे जीव हउवाऽ ! घंटा भर पहिले उहां से निकल गइलाऽ... तब से इहैं खड़ा हउवाऽ? सड़किये पर मुंह मारे में मजा मिललाऽ काऽ? ’’
प्रसाद हंसे, ‘‘ अरे पण्डित जी, हमलोगों ने वहां तो आपकी बात नहीं मानी लेकिन बाहर आये तो ध्यान आते ही आप पर दया गयी... हमलोगों के रहते आपको अकेले भूत की तरह भटकते हुए जाना पड़े, यह कोई अच्छी बात है क्या? ’’
पाठक पास गये। प्रसाद के सामने मुंह लाकर सिर को खास अंदाज में हिलाया, ‘‘ वाह गुरु! क्या खूब कही! खैर! तो, आपकीआम की फांकका क्या हाल है ? ’’
आम की फांकपर जोरदार ठहाका! दास देर तक हंसते रहे। प्रसाद झेंप गये। पीछे कुछ दूरी पर घोड़ागाड़ी में कोचवान ने खांसा। पाठक ने कानों का यंत्र टटोलते हुए मुड़कर ताका, ‘‘ देखाऽ! ... लोग इहां से हिलत नइखन! कोचवान बेचारा कब से लैम्प में मोमबŸाी जलइले इंतजार करत हौ! अरे, तूंलोग गाड़ीवान के केतने नुकसान करइबाऽ? गजबे हउवाऽ! इहां से हिलबाऽ? ’’
कोचवान नीचे उतरकर वहीं खड़ा हो गया। दास उसकी ओर मुड़े, ‘‘ हमलोग कहें तभी लैम्प जलाया करो यार! ’’ वह कुछ नहीं बोला। हल्का-सा खांसकर रह गया।
पाठक उसकी ओर बढ़े, ‘‘ अरे, हाय-हाय! बनियों की Ÿाी बेकार ही जल रही है, ’’
प्रसाद और दास ने मिलकर तत्काल एक दोहा रच लिया। प्रसाद मुस्कुराने लगे। दास ने राग में गाना षुरू कर दिया-

बनियों की Ÿाी जले, जले तुम्हारी ,
पाठकजी तुम हो नहीं, हो तुम पूरे भांड़!

ठहाका गूंज उठा। कोचवान सिर झुकाये चुपचाप प्रतिक्रिया-विहीन बना रहा।
पाठक लपककर वापस आये, ‘‘ अरे यार! मैंने बनिया आपदोनों को थोड़े ही कहा, मैंने तो कोचवान की पीड़ा देखकर उसके बारे में कहा कि बेचारा जितना कमायेगा नहीं उतने की तो मोमबŸाी गल जायेगी! इसमें आपदोनों काहे पगला गये? बात को ठीक से समझ-बूझकर ही तो ऐसी कविताएं छेरा कीजिये..! ’’
दास ने हंसते हुए तीर चलाया, ‘‘ गड़ गयी ? कहां गड़ी ? ’’
पाठक का लहजा षिकायती, ‘‘ अच्छा, तो अब समझा! इसका मतलब कि तुम ही मेरे रवीन्द्रनाथ को बरगलाकर पटाखेदार दोहे लिखवा रहे हो! ’’
दास चुप-चुप मुस्कुराते रहे। प्रसाद ने मोर्चा सम्भाला, ‘‘ चलिये, कभी-कभी बनारसी माहौल भी बन जाया करे तो कोई हर्ज नहीं! ’’
‘‘ हां, हां! एकदम! तभी तो मजा भी आयेगा! बिना गाली के बनारसी मौसम थोड़े ही बन पाता है! ’’ बोलकर वे निर्विकार भाव से हंसने लगे, ‘‘ लंगोटे तऽ बनारस के असली पोसाक हौ और झमाझम गारी आपन भाखा! ’’ दोनों गाड़ी पर बैठ गये। पाठक साइकिल पर चढ़कर बढ़ गये।
चालीस
भीतर अच्छा-खासा हंगामा! आर्यभाशा पुस्तकालय में घुसते ही प्रसाद और दास चकित। दृष्य चौंकाने वाला।आबनूस का कुन्दाबेंच पर अविचल बैठा हुआ है! टेबुल पर अखबार के पन्ने खोले-फैलाये हुए। उसके सामने हाथ लहरा-लहराकर चीखतीं एक वृद्धा एक युवती। प्रलयंकारी अंदाज में। आष्चर्य! सीधे हो रहे वाक्-हमले का तो जैसे उस पर कोई असर ही नहीं पड़ रहा हो!
‘‘ देखिये, मेरा जो संदेह था, लगता है सही ही निकला! ’’ आगे बढ़ते हुए प्रसाद ने चिन्ता छलकायी, ‘‘...यह इकहराआबनूस का कुन्दाइन दो स्त्रियों का दुहरा निषाना क्यों बना हुआ है?’’
दास ने सामने आंखें गड़ाये रखी, ‘‘ हां! दोनों स्त्रियां तो एक साथ उसी पर बरस रही हैं! यहआबनूस का कुन्दासचमुच किसी आबनूसी मामले का षिकार तो नहीं बन गया है? ’’
‘‘ अब यह तो पता करना होगा कि यह अभी षिकार बन रहा है या खुद यही कोई पुराना षिकारी रहा! कहीं ऐसा तो नहीं कि यही कोई पलायित आखेटक हो और यहां पनाह पाकर इतने दिनों तक बगुला भगत बना छुपा-दुबका रहा! ’’
तेज कदमों से षोर को पास से लांघते दोनों आगे बढ़ गये। पाठक के निकट पहुंचे। वे सिर गड़ाये कुछ लिखने में मषगूल। प्रसाद ने सामने की खाली कुर्सी सीधी की और बैठ गये, ‘‘ क्या बात है बन्धु, महिलाएं क्योंआबनूस के कुन्देपर आगबबूला हो रही हैं? क्या है मामला? ’’
पाठक ने धीमी कही हुई यह बात भी सुन ली। वह भी बगैर कान के यंत्र टटोले। प्रसाद और दास ने साष्चर्य एक-दूसरे को देखा सिर हिलाया। पाठक धीमे बोले, ‘‘ आपलोगों ने तो मजाक ही किया होगा लेकिन लगता है कि आपके दिये नाम की सीधी परछाईं इस लड़के के ऊपर पड़ गयी है! ’’
दास जिज्ञासा से बेचैन हो उठे, ‘‘ बताइये-बताइये! जरा जल्दी... साफ-साफ बताइये! हुआ क्या, भई! इसने क्या सचमुच कोई गुल खिलाया है ? ’’
‘‘ अरे, आप धीरे से वहीं काहे नहीं चले जाते? जाकर उनलोगों के पास खड़े हो जाइये... सब पता लग जायेगा... कुछ बातऐसी-वैसीहै जरूर... ’’
दास लपक कर षोर की ओर बढ़े। निकट पहुंच टेबुल के पास खड़े हो गये। अखबार पलटते हुए कनखी और कान झगड़े पर ही केन्द्रित। वृद्धा चिल्ला रही है, ‘‘ कोई इसे समझाओ भइया! यह लड़का मेरा दामाद है... इसी बिटिया का पति! लेकिन जाने कैसे इसका दिमाग ही उलट चुका है... ऐसी सुन्दर और गुणी पत्नी को छोड़कर चुपके से भाग आया है... बहुत मुष्किल से खोजते-खोजते यहां तक तो पहुंची हूं ... इसे मेरे साथ भेजो भइया! ’’
युवती उसे जलती निगाहों से ताक रही है, गोया मौका मिलते ही उसे झुलसाकर रख देगी!
दोनों मां-बेटी एक बार फिर तेज-तेज चिल्लाने लगीं, ‘‘ यहां कैसे ध्यान गड़ा कर पढ़ रहा है! घर और परिवार पर तो कभी कोई ध्यान नहीं दिया! सबको छोड़कर रात में पता नहीं कब उठकर भाग गया ...खोजते-खोजते हम हैरान-परेषान! भटकते-भटकते बहुत दिक्कत से तो यहां पहुंचे हैं हमदोनों... अब इसको यहां से लेकर ही जायेंगे... छोड़ेंगे नहीं!’’
प्रसाद भी दास के निकट गये। दोनों बुदबुदाते हुए आपस में धीरे-धीरे बतियाने लगे। कानाफूसी पर मां-बेटी का ध्यान बंट गया। चिल्लाना छोड़कर वे इधर ही ताकने लगीं। इस पर ध्यान जाते ही प्रसाद वहां से धीरे से आगे बढ़ गये। दास रूके रहे। खिसकते हुए प्रसाद बुदबुदाये, ‘‘ अरे मित्र, भागो! कहीं फंस्सव्वल हो जाये! कहीं यह महिला तुम्हें भी विवाद में लपेट ले! ’’
दास भी झटककर चल पड़े। वे भी पाठक के टेबुल के पास गये। उन्होंने प्रसाद को पूरा मामला बताया। पाठक भी अपने श्रवण-यंत्र टटोलते हुए कान सटाये जा रहे थे। दोनों ने मिलकर सतर्कता से कुछ बंधे षब्दों और संयमित संकेतों में उन्हें पूरा मामला समझा दिया। महिलाओं की कांव-कीच जारी थी।आबनूस का कुन्दाअब तक वैसे ही तमाम षोर-षराबे से एकदम अनछुआ बना बैठा सामने बिछे अखबार के पन्नों में सिर गड़ाये रहा।
अचानक दोनों इधर ही मुड़ गयीं और आने लगीं। तेज-तेज कदमों से। दास फुसफुसाये, ‘‘ अरे, यह क्या! दोनों युद्धांगनाएं तो इधर ही कूच कर रही हैं! भागिये, नहीं तो कहीं ऐसा हो कि वे आकर हमीं से उलझ पड़ें! ’’
प्रसाद हड़बड़ाकर खड़े हो गये। पीछे मुड़े और उन्हें ताकते हुए महीन स्वर निकाला, ‘‘...हमला तो सामने से बोला जा चुका है मित्र! ...बाकी तीन तरफ दीवारें ही दीवारें हैं... अब तो दो ही विकल्प षेश हैं- युद्ध या बलिदान! ’’
सामने से आतीं वे करीब गयीं। दास ने महीन तीर छोड़ा, ‘‘ हो सकता है यह वागाक्रमण पाठक जी के लिए कोई चामात्कारिक-लाभदायक दुश्प्रभाव पैदा कर दे! ’’
‘‘ मतलब ? ’’ दोनों सामने पहुंच चुकी हैं, किंतु जिज्ञासा थमी नहीं।
‘‘ हो सकता है इन दोनों की सुरसा-चीखों से पाठक महाषय के कान की एक जमाने से सोयी नसों की कुंभकर्णी मूर्च्छा तार-तार हो जाये! ऐसी लाभदायक दुर्घटनाएं कभी-कभी हो जाया करती हैं!’’
दोनों आकर सामने खड़ी हो गयीं। आष्चर्य कि वे अब तक चुपचाप हैं! मूर्Ÿिावत्। इस दौरान वे सम्भवतः इन भद्रजनों से बात करने के लिए स्वयं को मानसिक रूप से तैयार करती रहीं।
पाठक ने उकताहट भरे चेहरे से उनकी ओर प्रष्नवाचक दृश्टि उठायी। बेटी तो चुप रही, मां ने मुंह खोला। कुछ देर पहलेआबनूस के कुन्देके पास जो आवाज आग की लपटों की तरह निकल रही थी उसमें अब आग्रह-अनुरोध की मुलायमियत गूंथी हुई है। उसने बहुत षालीनता से अपनी बात षुरू की, ‘‘ आपलोग पढ़े-लिखे लोग हैं! देखिये यह हमारी बिटिया है... इसकी जिन्दगी खराब होने जा रही है... यह आदमी इसका पति है जो एक दिन बिना किसी खास वजह के, एक मामूली बात पर बिगड़ गया और घर-परिवार को त्यागकर भाग खड़ा हुआ... हमलोगों ने इसे कहां -कहां नहीं खोजा..! इसे खोजने में कई रिष्तेदारों को लगवाया... हमदोनों भटकती हुई यहां तक आयीं... इस खोज-खोजव्वल में कितना पैसा बर्बाद हुआ!... आज जब यह यहां दिखाई पड़ा है तो हमारे कलेजे को थोड़ी षान्ति पहुंची है... अब आपलोग हमें एक सहायता कीजिये... ’’
तीनों उसकी ओर सहमे-सहमे अविष्वास से ताकते रहे। वह आगे बोली,‘‘ इस भटके हुए लड़के को समझा-बुझाकर आपलोग ही रास्ते पर ला सकते हैं...! अभी यह भोला है, इसने दुनिया नहीं देखी है... इसलिए दिमाग आसमान पर चढ़ा रखा है! ... आप लोग एक मेहरबानी कीजिये, लग-भिड़कर इन दोनों का आपस में मेल करा दीजिये! ’’
तीनों चुप। कभी आपस में एक-दूुसरे का मुंह, तो कभी उन दोनों की ओर ताकने लगते। मां चुप हुई तो बेटी ने हाथ जोड़ लिया, ‘‘ हां! आपलोग चाहें तो समझा-बुझाकर उनका मन बदल सकते हैं... वह बहुत मुलायम दिल के हैं... दिक्कत एक ही है कि छोटी-छोटी बात पर भी गहराई से सोचते हैं... इसी आदत के चलते वे कब किस बात पर एकदम उलटा सोच लेंगे, यह पास रहकर भी समझना आसान नहीं होता... ’’
दास संजीदा हुए, ‘‘ आपलोग एक-दो दिनों का समय तो दीजिये! हमलोग अवष्य यह पूरा प्रयास करेंगे कि बात सम्भल जाये! इसके लिए पहले तो यह पता करना होगा कि आखिर वह बात कौन-सी थी जिसके चलते उसने एक झटके से घर छोड़ दिया और वहां से भाग गया... ! ’’
दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा जैसे वे आपस में कोई सहमति बना रही हों। मां ने अपनी आवाज को भरसक दबाया, ‘‘ इस बीच यह कहीं भाग तो नहीं जायेगा ? ’’
‘‘ भागने वाले आदमी को आज तक कोई रोक सका है ? जानवर तो है नहीं कि गले में पगहा डाल कर खूंटे से बांध दिया जाये! इसे भागना ही होगा तो घर लौटने के बाद वहां से भी तो फिर भाग सकता है...! ’’ दास ने उन्हें परिस्थितियों का पाठ पढ़ाया।
दोनों ने सहमति में सिर हिलाये। दास ने धीरे से बताया, ‘‘ एक विद्वान हैं जगमोहन वर्मा, उन्होंने ही तरस खाकर इसे अपने यहां आश्रय दे रखा है... तुमलोग यहां से निकलकर आहिस्ते से उन्हीं के घर पहुंच जाओ... यह भी यहां से निकलकर वहीं पहुंचेगा ही... वहीं कोई दबाव बने तो बनाना... नहीं तो इधर तब तक हमलोग कोई दूसरा उपाय सोचते हैं! ... ’’
दोनों इस पर संतुश्ट दिखीं। उठीं और साथ-साथ पीछे मुड़ गयीं। 
दास और प्रसादआबनूस के कुन्देके पास पहुंच गये। वह मुस्कुराकर कुछ यों मुखातिब हुआ जैसे अब से कुछ देर पहले उसके साथ कुछ हुआ ही हो।
उसकी मुस्कान पर प्रसाद जैसै भीतर से चिढ़ गये हों, ‘‘ मैं तो तुम्हें अब तक  ‘आबनूस का कुन्दाही समझ रहा था, लेकिन अब तो तुम्हेंअगर की गांठभी मानने को विवष हो गया हूं...’’
वह पहले झेंपा फिर अचकचाकर ताकने लगा। उस पर दोनों महिलाओं की लानत-मलामतों का जितना असर नहीं, उससे कहीं अधिक प्रभाव प्रसाद के इस अंदाज एक वाक्य का पड़ा। वह बगलें झांकने लगा। प्रसाद बोले, ‘‘ आबनूस और अगर का मतलब समझ रहे हो ? ’’
वह चुपचाप मटर-मटर ताकता रहा। प्रसाद का चेहरा भभूका हो गया, ‘‘...मैंने आज तक अपने जानते किसी के लिए कभी ऐसा कोई षब्द नहीं प्रयोग किया जिससे अमुक व्यक्ति को अनावष्यक भावनात्मक ठेस पहुंचे... लेकिन तुम्हारा रवैया देखने-जानने के बाद मेरी सहनषीलता चूक गयी... ’’
उसके होंठ जैसे सिल गये हों। वह चुपचाप, स्थिर भावषून्य ताकता रहा। प्रसाद आगे बोले, ‘‘ आबनूस और अगर, दोनों दुर्लभ सुगन्धित लकड़ियां हैं... अगर तो सुगन्ध के मामले में चन्दन को भी मात दे देता है! ’’
वह हल्का-सा मुस्कुराया। उसकी आंखों में हाहाकार! प्रसाद से यह छुप सका। वे एक पल के लिए रूके, दूसरे ही क्षण उनका स्वर सांद्र हो गया, ‘‘ तुम जिस चीज से जितना भागोगे, वह भीतर-भीतर तुम्हें उतना ही बल्कि उससे दुगुनी-चौगुनी रफ्तार से दबोचेगी! तुम अगर घर को छोड़कर भाग रहे हो तो तुम्हारे भीतर तुम्हारा वही घर अपने से कई गुना बड़ा आकार लेकर धंसेगा और तुम्हें खदेड़ने लगेगा... वह हर क्षण तुम्हें जैसे दबोचता रहेगा!... दरअसल, पलायन मुक्ति-मार्ग नहीं, आत्मोत्पीड़न है... अपनी ही आत्मा का बर्बर षमन! ’’
इकतालीस
प्रसाद प्रातः भ्रमण से लौटने लगे तो बचनू भी साथ हो लिए। वे अपनी तुतली बोली में काषी नरेष महाराज ईष्वरीप्रताप नारायण सिंह के निधन पर लगातार षोक-भाव व्यक्त करते जा रहे हैं! प्रसाद ने अचानक अपना लम्बा मौन तोड़ते हुए उनकी ओर ताका, ‘‘ यार, बचनू तुम नाहक ही करुणा प्रवाहित किए जा रहे हो... ’’
साथ चल रहे बचनू अचकचा गये। गौर से उनकी बातों पर ध्यान टिका दिया। प्रसाद ने अपने स्वर को अपेक्षाकृत संयमित किया, ‘‘ ...राजा की कभी मौत नहीं होती... सिंहासन को किसी ने कभी रिक्त देखा है? राजा कभी अनुपस्थित नहीं होता... ’’
बचनू चलते-चलते कौतूहल से ताक लेते। प्रसाद की आवाज में धातुओं की टनक बढ़ती जा रही है ‘‘...देखा नहीं! महाराज प्रभुनारायण सिंह का तत्काल राज्याभिशेक हो गया... क्या काषी नरेष का पद एक दिन भी रिक्त रह सका... इसलिए कम से कम हमारे-तुम्हारे जैसे लोगों के लिए फिलहाल चिंतित होने की कोई आवष्यकता नहीं... हां, व्यक्ति रूप में महाराज ईष्वरीप्रताप नारायण सिंह की कमी हमेषा बनी रहेगी... वे धर्म, नीति षास्त्रों के गहन ज्ञाता थे... ’’ घर के आहाते में प्रवेष करते ही प्रसाद ने सामने बैठकखाने के बाहर तख्त पर दृश्टि डाली तो उन्हें हंसी गयी, ‘‘ अरे, यह क्या! लगता है सुबह-सुबह ही आज पंचायती करनी होगी... ’’
बचनू धीरे से तुतलाये, ‘‘ ...त्या बात है... तौन हैं ये लोद ? ’’; क्या बात है... कौन हैं ये लोग ?द्ध
समीप पहुंचते प्रसाद ने धीरे से बताया, ‘‘ ...यह लड़का आबनूस का कुंदा है और अगर की गांठ भी... वृद्धा उसकी सास है और युवती उसके गले में फंसी हुई सांस! ’’
समीप पहुंचते ही वे तीनों खड़े हो गये। प्रसाद ने हंसते हुए उन्हें वहीं बैठ जाने को कहा और बचनू के साथ बैठकखाने की ओर कदम बढ़ा दिये। उन्होंने संक्षेप में बचनू की जिज्ञासा को षांत किया और भीतर चले गये। कुछ ही देर में लौटे और बचनू के साथ बाहर गये। युवक ने दोनों हाथ जोड़ लिए और फिर खड़ा हो गया, ‘‘ ...आपने मुझे जो जीवन-दृश्टि दी इससे मैंने पहले स्वयं को पहचाना फिर अपनी जीवन-संगिनी का अर्थ समझा-जाना... अब मुझे जीवन को लेकर कोई भ्रम या षिकायत नहीं है... आप आदेष करें, मैं अपनी अर्द्धांगिनी सासु मां के साथ अभी इसी वक्त घर लौट जाना चाह रहा हूं... वहीं मैं अपने पुराने विद्यालय में जाकर पूर्ववत् षिक्षण -कार्य में लग जाना चाहता हूं... ’’
बचनू तीनों को आंखें फाड़-फाड़कर ताके जा रहे हैं। प्रसाद मुस्कुराये, ‘‘ वाह भई! क्या मेरे कहने भर से तुम्हारी आंखें खुल गयीं? तब तो आज मुझे स्वयं के कहने-सुनने की सच्ची सार्थकता दिखने लगी है... यह बहुत अच्छी बात है... ’’
युवती ने आकर पांव की ओर झुकने का उपक्रम किया तो प्रसाद ने तेज षब्दों में उसे रोक दिया, ‘‘ नहीं... नहीं! ऐसा कत्तई नहीं! इसमें मेरे पांव की कोई भूमिका नहीं...मैंने तुम्हारे पति को जो परामर्ष दी वह बात या ज्ञान हमारे मनीशियों के अनुभव-विचार हैं... इसके लिए उन्हीं का आभार माना जाना चाहिए और उन्हें धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए तुमलोगों को ज्ञान के ही अर्जन-उत्सर्जन का व्रत लेना चाहिए... ’’
वृद्धा की आंखें भरी हुई हैं और दोनों हाथ जुड़े हुए। प्रसाद समीप जाकर बोले, ‘‘...यह मेल-मिलाप आपके मातृ-संकल्प के चलते ही हुआ है... आप ही इन बच्चों की वास्तविक गुरु हैं... आपका स्नेह सबसे बलवान है... उसी ने इस जोड़ी को बचा लिया और आगे भी संरक्षित रखेगा...’’
उन्हें बिठाकर प्रसाद फिर भीतर लौटे। बचनू चुपचाप खड़े-खड़े ताकते रहे। प्रसाद लौटे तो उनके पीछे-पीछे चेखुरा भी। उसके हाथ में नये वस्त्र मिश्ठान्न आदि से भरी चमचमाती पीली परात है। दूसरे ही पल विंध्यवासिनी देवी भी सिर पर आंचल संभालती निकल आयीं। उनके हाथ में पीतल की छोटी कटोरी है जिसमें मुट्ठी-भर दूब बाहर झांक रही है! प्रसाद ने संकेत किया तो वह उधर बढ़ गयीं। युवती ने बात समझ ली। उठी और विंध्यवासिनी देवी का चरण-स्पर्ष करने लगी। उन्होंने उसे उठाकर गले लगा लिया। युवती ने आंखें झुकाकर आंचल फैला दिया। चेखुरा परात लिए हुए पास गया। विंध्यवासिनी देवी ने कटोरे को परात में रख दिया और नये वस्त्र, जीरा-हल्दी, अक्षत-दूब, आभूशण और मिश्ठान्न उठा-उठाकर उसके आंचल में भरने लगीं। परात से ही सिन्दूर ले-लेकर उन्होंने उसकी मांग को पांच बार भरा। युवती के मुख पर ललौहीं कोमल संतृप्ति पुत गयी। अखण्ड धवल सौभाग्य-बोध भी! उसने भी सिन्दूर ले-लेकर उनकी मांग को पांच बार भरा। वह अपने परिपूर्ण आंचल को समेटती-सम्भालती हुई पुनः झुकी और उन्हें प्रणाम करने लगी। वृद्धा की आंखें झर्-झर् बरस रही हैं।
प्रसाद के मुखमण्डल पर खिली प्रसन्नता का रंग प्रातः की मीठी रष्मियों जैसा है। उनकी आंखों में जैसे स्वनिर्मित षब्द गोल-गोल चमक रहे हों। मुखर और सवाक्। बचनू अब भी मटर-मटर ताके जा रहे हैं।
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About Shyam Bihari Shyamal

Chief Sub-Editor at Dainik Jagaran, Poet, the writer of Agnipurush and Dhapel.
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5 comments:

  1. 'रविवार' पर आपकी कहानी पढ़ी थी। बहुत अच्छी लगी थी। यह किताब आ जाए तो जरूर पढ़ा जाएगा।

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  2. मैं इस योग्य नहीं की कि इसके शिल्प, कथ्य या कथा वस्तु पर कोई टिप्पणी कर सकूं...पर एक बात जो मैंने महसूस की..कि मैं जब पढ़ने लगा तो मुझे कोई रुकावट महसूस नहीं हुई और मैंने इसे आद्योपांत ग्रहण किया..ऐसा मैं सोचता हूं। जब यह मार्केट में आ जाए तो कृपया सूचित करने का कष्ट कीजिएगा।।

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  3. Mitr PAVAN NISHANT ji, Main pathakon-mitron aur tamam gyat-agyat sahity-rasikon ke lie hi likhata hun. Akhabar me noukari karata hun, raat bhar jagakar! Lekhan k lie samay nikalana mere lie sharir se apane hathon khud ka rakt garane ki tarah hai. Kabhi kisi Aalocchak ka dhyan kar koi ek shbd bhi nahin likha! Aap jaise sahity-rasik hi mere asali nirnayak hain. Aapako yah pasand aaye, meri mihanat qamayab hui! Lekhan-sukh ki yahi parakashtha bhi hai! AABHAR... Pustak-roop samane aate hi aapako suchit karoonga! Dhanyvad!

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  4. अदभुत !पढ़ कर जो संवेग निकल रहे हैं ,उन्हें ओढकर सोने को जी चाहता है |बधाई

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  5. Vaaah Bhai AAVESH ji! ...Lekin sone ka yah karykram sankshipt hi rakhiyega ...main nirntar kuchh na kuchh likhkar hazir hote rahane ki ichha rakhata hun ...kahin jagane k lie chilla kar hankana na pade! ...Utsahvardhak pratikriya k lie AABHAR aur DHANYVAAAAAD...

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