कवि धूमिल की अर्धांगिनी मूरत देवी गंभीर रूप से अस्वस्थ

     दवाएं जहां हो चुकीं अप्रासंगिक 

        प्रार्थना अब इकलौता रास्ता 


ता रास्ता

                         - श्याम बिहारी श्यामल 

  माता मूरत देवी से यह ऐसी पहली भेंट हुई जब उनसे बातचीत नहीं हो सकी! होती कैसे, वह अचेत पड़ी हैं. दवाएं अप्रासंगिक हो चुकी हैं. मुंह ज़रा-सा खुल पा रहा तो सिर्फ़ तरल के, कुछ अन्य ग्रहण नहीं हो पा रहा. चार पांच दिनों से थोड़े-थोड़े अंतराल पर चम्मच से जल और नारियल पानी दिए जा पा रहे. 

उनके दोनों सुपुत्र डॉ. रत्नशंकर पाण्डेय और आनंद शंकर पाण्डेय का परिवार सेवा-सुश्रुषा में जुटा है. सभी चिंतित, सब बेचैन. हर कोई निरुपाय. 

  माता जी अस्सी पार की हैं. सविता जी की उनसे सघन-सजल   निकटता रही है. जब भी हम पहुंचते एक से एक क्षण सजीव होने लगते. सामने साकार.  

  ,🍂 क्षण जब जी उठते 🍀 रत्नशंकर जी के साथ इधर मेरी साहित्य-समाज पर बातचीत शुरू होती, उधर वहीं पास ही माताजी और सविता जी का अपना संवाद चल निकलता! शब्दों में सजकर भी उनसे इतर छिटकता, उनके पार जाता यह भाव-विनिमय देखते बनता. 

  पहले तो, वह बहुत दिनों बाद आने पर विलंब को लेकर गहरा एतराज जतातीं. उसके बाद, हाल-चाल. बतकही के कितने रूप! संवेदना के क्या-क्या घोंसले-घरौंदे! जब वह सविता जी के किसी वस्त्र का रंग काला देख लेतीं तो इंकार में सिर हिलाने लगतीं. तुरंत इससे बरजतीं,  '' सोहागिन के करिया रंग माना हौ... ई ना पहिरे! '' (सुहागिन के लिए काला रंग वर्जित है, इसे मत पहनना!) 

  🍀 धूमिल-मूरत, प्रथम मिलन! 🍂 शुभकामना से भरा उनका मुखमंडल दीपित हो उठता. सविता जी उनसे धूमिल के बारे में पूछतीं, पहली बार कैसे मिले थे आपदोनों? 

  मूरत देवी शरमा उठतीं. ब्रह्मांड जैसे घूर्णन करने लग जाता! वह सिर पर साड़ी के घेरे को आगे खींचने और घूंघट करने-मुंह ढांपने लगतीं. सविता जी की खिलखिलाहटों से सब कुछ झंकृत हो उठता. व्यतीत को प्रतीत कर काशी का आकाश स्मिति से रंग जाता! 

  विसर्जित के सर्जन अर्थात् अरूप के रुपायण के ऐसे ही संवाद के क्षणों में मूरत देवी का बताया एक प्रसंग स्मृति में दृश्यांकित है! अपनी पहली पुस्तक छपने पर कवि धूमिल की अपने घर-आंगन में बिछली वह नैसर्गिक याकि जैविक अथवा विरल दाम्पत्य-दमक से सिक्त प्रसन्नता! 

  🍂 पहली पुस्तक, प्रथम प्रति! 🍀 शरद की एक जागती-सी भोर हो जैसे! अलसित और शीतित. और, हटती चादर से खुलता-उजियाता आसमान का मुखमंडल! अचानक झरझरा कर ऊपर से गिरती, सामने पंखुड़ियों-सी फैलती सुवासित गुलगुली धूप! 

  अनुभूति के पट पर धूमिल-काल सजीव! दुआर से आंधी की तरह अंगनई को आते, सघन तन संपुष्ट मन कवि याकि पति धूमिल... आवेग की गति बिजली की, रंग-ओ-सूरत इंद्रधनुषी. उन्होंने पहली पुस्तक की यह  प्रथम प्रति अपनी मूरत को लाकर सौंपी! 

  🍀 शब्द बचाएं हमारी संवेदना! 🍂 मूल्यवान व्यतीत को अतीत से खींच लाने वाले ऐसे संवाद-पराक्रम वीडियो के हवाले छोड़ना कहां भरोसेमंद, जो फॉर्मेट ही अल्लम-गल्लम की क़दम-क़दम पर झोंकम-झोंक उबाऊ-डराऊ होता 'मल्टी डिलीट' के बूते की बात रह गया है! क्या पता देखते ही देखते यह कहां जा धंसे, बिसर जाए और किसी दिन कचरे उलीचने की उन्मादित खीझ में अपने ही हाथों  निराभास नष्ट होकर रह जाए! 

 लिहाज़ा बात-बतकही में, काल के संघर्षणों की उड़ती चिंगारियों में कोई दृश्य आंखों के सामने खिंच-चमक जाए तो उसे छूटने नहीं देना ही दुरुस्त है! यह सब लगे हाथ शब्दबद्ध होता चले. अभिधा से व्यंजना की अपनी सभी व्यंजित विधाओं में. तभी तो भाषा संबद्ध संवेदना की ताज़गी और तहें संग-संग तहबंद करती चल सकेगी! 

  🍂 लोक-अलोक का आलोक 🍀 भावनाएं जब जुड़ती हैं तो आयु का दुगुने का अंतर कैसे शून्य हो जाता है! ममता और श्रद्धा, लोक-अलोक की आलोकित युगलबंदी! माता मूरत और सविता जी के बीच वह भाव-प्रवाह! दुखम-सुखम का अटूट सिलसिला. घर की बात, बच्चों की जानकारी, रोजमर्रे के संदर्भ! बातों से बातें, बातें ही बातें. चलते समय माता जी अत्यंत सजग हो उठतीं  कहने लगतीं, '' आज रह जा! '' मां का दुलार पा सविता जी निहाल! 

  दो ही साल पहले, रत्नशंकर जी अवकाश ग्रहण कर चुके थे. घर पर उन्होंने कोई अनुष्ठान रखा था. हम कहीं व्यस्त थे लेकिन बुलावा था तो कहीं अटके रह जाना  मुमकिन कहां! 

  भागते हुए हम थोड़े विलंब से पहुंचे. शाम रात बन गई थी. झालर सजे थे, नीचे से ऊपर तक सजा घर जगमग! सीढ़ियों से ऊपर ले जाए गए. कई रिश्तेदार परिवार और आस-पड़ोसियों की भी उपस्थिति. उत्सव का घर, चहल-पहल! भोजन आदि के बाद तीसरे तल्ले से उतरने के बाद, प्रस्थान से पहले सविता जी माता जी से मिलने भीतर चली गईं. 

  🍀 बेटियां दो, मां एकमेव! 🍂 भीतर माता जी उन्हें देख खिल उठीं. वही स्नेहादेश, '' आज रुक जा!'' सविता जी ने मेरी ओर संकेत किया, तात्पर्य इनका लिखना-पढ़ना बाधित न हो जाए! पास ही उनकी सुपुत्री भी थीं, अपनी मां के साथ यह संवाद देख वह चकित और प्रसन्न. माता जी ने सविता जी को बेटी का पूरा परिचय बताया. बिटिया की खूबियां और उसके मीठे-मृदुल स्वभाव, मां से अधिक मुखर और कौन प्रकट कर सकता है! जी भरकर भूरि-भूरि प्रशंसा.

  सविता जी तो सविता जी ही, हां-हूं करती अचानक पूछ बैठीं, '' हं... हं! ऊ सब ठीक बा... ई बहुत बढ़िया बाड़ी...  बाकिर एक बात बताईं...'' (हां... हां वह सब ठीक है... यह बहुत अच्छी हैं लेकिन एक बात बताइए!)

  🍂 सबसे सुंदर! 🍀 मां और बेटी दोनों घोर जिज्ञासु हो उठीं. सविता जी ने स्वयं और उनकी तरफ़ इशारे करते हुए पूछा, '' हमनीं दुनों में जादे सुंदर के बा? '' (हम दोनों में ज़्यादा सुंदर कौन है?!)

  माता जी एक पल भी नहीं अटकीं, दोनों हाथ से सविता जी की बांह पकड़ ली, '' तूं! '' (तुम!)

  बिटिया का मुंह खुला का खुला! अब वह अपनी मां से अचरज कैसे न जतातीं, '' आइह माई! ई का! ''  (ओह मां! यह क्या!)

  मूरत देवी कहां भाव-संवेदना की कोई साधारण वाहिका! एकदंत मुख की झरझराती मुक्तछंद हंसी और दोनों बेटियों पर फिरती छंदोबद्ध दृष्टि से वह अपना साम्य-पद्य प्रकट करती रहीं! बेटियां सामने भले दो, मां तो एकमेव! नियति ने जिसे सीधे नहीं मिलाया, उन्नीस कर दिया ; दुलार का हाथ पहले उसी के शीश कि यह भी हो ले बीस, सबके समरूप! तभी तो यह वह (ममता) है जो सृष्टि का आदिम समता-स्रोत है अजस्र, अक्षय. उसके समक्ष उन्नीस-बीस का टिकना कहां संभव! 

  😭 बनारस का लोहटा रोड इलाका. 23 फरवरी 2026, सोमवार! आनंद शंकर जी का घर. 

  सामने, अगरबत्ती के उठते सुवास और गुंजायमान शिव-स्त्रोत की यंत्र-ध्वनि के बीच, बिस्तर पर वही माता मूरत देवी हैं, चेतना क्षीण! शब्द से दूर, वाणी से वंचित. 

  सविता जी पहुंचते सिरहाने बैठ गईं. वह, माता जी का शीश सहलाने लगीं. कुछ ही  देर बाद मुलायम कंबल के नीचे हाथ में शक्ति का संचरण लक्षित होने लगा. 

  '' माई... माई!'' उनकी पुकार! कौन चेतना इसे अनसुनी रह जाने दे! उसे नियति ने जितनी भी क्षीण कर दिया हो, वह अपनी सारी क्षमता झोंक देने में कहां चूकने वाली!  

  सविता जी ने कंबल से निकाल, सक्रिय हो चला हाथ थाम लिया.मुख न सही, यह (हाथ) तो बोलने लगा, उसने हथेली को अपना संदेश देना शुरू किया! इस व्यक्त को फिर अभिव्यक्ति की क्या विवशता, किस शब्द वाणी की निर्भरता! चेतना का क्षीणतर अंश तक तो इस तरह निज भाषाभास से अवंचित है...

  माता की आँखें नहीं खुल रहीं, होंठ तो फड़क रहे. चम्मच से नारियल जल! सविता जी उन्हें यह प्राण-ऊर्जा घूंट अपने हाथों पिला रहीं. जल गले से उतर रहा, मालूम पड़ते ही सबको थोड़ी राहत! 

  रत्नशंकर और आनंद शंकर, सुपुत्रगण पास आ गए. सभी परिजन, साथ हम भी...  

  🙏 प्रार्थना के पल! 🙏 यहां-वहां हर आंख में टिमटिम बल रहे प्रार्थना के शब्द अनसुने कैसे चले जाएंगे! माता मूरत कब उठकर बैठ और चल-फिर सकेंगी! दुःख से कातर है पाण्डेय-परिवार. जुड़े हम सब उद्विग्न, बेचैन! यह वह मुक़ाम है जहां चिकित्सा विज्ञान लाचार है... बहुत कठिन है यह दौर, परिवार के लिए, सबके लिए... 

  पूर्ववत कब खिल सकेगी माता मूरत की चिरंतन मुस्कान?  

                                                             (8303083684)

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About Shyam Bihari Shyamal

Chief Sub-Editor at Dainik Jagaran, Poet, the writer of Agnipurush and Dhapel.
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