देखी यहां हर शै में बेचैनी एक-सी हमने

झुकते दीवाने नीले चंदोवे के क्या कहने  श्याम बिहारी श्यामल  क़ायनात ने इतने प्यार से यूं ही नहीं पहने है सूरज चाँद सितारे धर...
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उल्फत कल नायाब थी कल भी लाज़वाब

आग से मत खेलिए ज़नाब श्याम बिहारी श्यामल  क़ाबू अभी कर लीजिए खतरनाक ख्वाब भूलकर भी आग से मत खेलिए ज़नाब बेक़ाबू लपटें कभी ...
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किस ज़माने से कितनी आंखों में

जो करना हो कर ले घटा जो काली घिरी है श्याम बिहारी श्यामल   सूरत-ए-हाल-ए-ज़हां कैसी यह  पास  मिरी है स्याह-ओ-सन्नाटे की जैसे बि...
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क़िरदार-ए-मज़ाक फ़टेहाल वह

वाराणसी में विजया सिनेमाहॉल में चौदह नवंबर(वर्ष 2018) को फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' की स्पेशल स्क्रीनिंग के दौरान विख्यात कथाकार ...
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कौन चीख रहा हमारे भीतर

मंज़िल क्यों निढाल पड़ी  श्याम बिहारी श्यामल  लम्हा-ए-क़ामयाबी मुश्किल घड़ी थी यह मंज़िल क्यों इस क़दर निढाल पड़ी थी दिल से ज...
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हालात हर हक़ीक़त सामने लाते थे

कैसी हम शक्ल दे पाते थे श्याम बिहारी श्यामल  जो कंधों से ऊपर उठाये जाते थे दर्जा-ए-ज़िंदा में वह कहां आते थे मर चुक...
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वह बे-पानी थे बरसते तो क्या

कहां सुरखाब के पर श्याम बिहारी श्यामल   अल्फाज़ बेमानी वह कहते तो क्या ख्वाब आस्मानी थे अब करते तो क्या गरज-गरज तड़क-तड़क...
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दौर-ए-फरेब बिछा था सीढी बनकर

चुप्पी चुभी थी मलाल बनकर श्याम बिहारी श्यामल   जो कह देते वह कभी करते नहीं थे जो करना था कभी वह खुलते नहीं थे क्य...
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हम तो वाक़िफ़ हैं वह असल रंगसाज़ हैं

लफ्ज़ मुक़म्मल हैसियत   श्याम बिहारी श्यामल   क़रीबी जो शातिर और साजिशबाज़ हैं शुरू से हमसे तहेदिल से नाराज हैं रंग बदल जब-तब...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल : धरती नहीं किसी भी खूंटी पर टंगी है

सूरज को अब तक तो हंकाना नहीं पड़ा   श्याम बिहारी श्यामल   यह फूल रंगा है न यह पत्ती रंगी है   धरती नहीं किसी भी खूंटी से...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल : कुछ ख़ास कहा न गया

 बेशर्म झूठ यह सहा न गया   श्याम बिहारी श्यामल  गुमज़ुबां अब और रहा न गया  हालांकि कुछ  ख़ास कहा न गया दिन को रात क...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल - 140

शिकंजा कसने की किसमें भला हिम्मत थी    श्याम बिहारी श्यामल   सबको कुबूल यहां पोशीदा हक़ीक़त थी छुपने-छुपाने की अब कहां ज...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल- 139

शरारा ने कहा ज़िंदा रहेंगे हम श्याम बिहारी श्यामल पूरा कुनबा उसी से परेशान था     क्योंकि उसके पास अब भी ईमान था आग ...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल- 133

तब तारीख संवरती है श्याम बिहारी श्यामल   दायरा टूटे बगैर बात कहां बनती है   कहां घड़ी की सुई कभी कहीं पहुंचती हैं  रोज़...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल- 132

शोलों को जिलाता श्याम बिहारी श्यामल   बादल में आग है उससे बात कर फ़ुर्सत में श्यामल से मुलाक़ात कर क्या कहाँ कैसे क...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल - 131

सच यही यह बस  श्याम बिहारी श्यामल  जिसे लगती हो लगे यह ग़ज़ल    हमारी  यह तो ज़िंदगी असल   अलामात अल्फाज़ मंज़र  सब      ...
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श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल- 125

सीधी-सी लकीर  श्याम बिहारी श्यामल  चुप्पी गहरे उतर कर  बजती है   सबसे अधिक खामोशी कहती है    गुजरता जाता है मंज़...
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