कविता के कुबेर
स्मरण 0 श्यामबिहारी श्यामल
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कुबेरदत्त ( 01 जनवरी 1949 - 02 अक्टूबर 2011 ) |
जितनी भी हैं स्वरलिपियॉ हमारे-तुम्हारे मौन के बीच
आओ उतारें उन्हें
आत्माओं के अम्लान पृष्ठों पर
न सही आज/कल ही सही
पूरब या पश्चिम के
उत्तर या दक्षिण के
बालक बालिकाऍं गाऍंगे उन्हें
-कुबेरदत्त (' 'धरती ने कहा फिर' की लंबी
कविता 'रोशनी के शहतीर पर' का अंश )
कविता 'रोशनी के शहतीर पर' का अंश )
कुबेरदत्त हमारी भाषा में वस्तुत: प्रतिपक्ष और मर्म-प्रत्यय के कवि हैं। प्रतिरोध के मुहाने पर किसी भी संशय या दुविधा से सर्वथा मुक्त किन्तु भावना प्रदेश के हृदय-तट पर प्रवाह-लय से युक्त। यह यों ही नही है कि उनके यहां सुलगते-जलते हुए सवाल और उनसे मुठभेड़ें भर नहीं हैं। इसके समानांतर उनके पास बहता-बजता हुआ कोमल-कान्त अक्लांत राग पद भी है। अपने काव्य सौष्ठव के साथ। महज पांच संग्रह में सिमटी चार दशकों की उनकी कविता निस्संदेह आयतन में आयत तो कदापि नहीं,किन्तु घनत्व-गुरुत्व से युक्त अवश्य है। विशद लोकायतन को समेटती, अद्भुत अनुभव-विस्तार और कथ्य-लक्ष्य-वैराट्य का अनुभव कराती हुई।
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ओम निश्चल |
कुबेर जी के अंतरंग मित्र और समीक्षक ओम निश्चल जी से उनके बारे में देर रात ( 02 अक्टूबर 2011 ) फोन पर ही किन्तु प्रदीर्घ चर्चा चलती रही। हफ्ता भर पहले ही पटने में एक आयोजन में उनके साथ रहकर लौटे वह अत्यंत भावुक होते रहे। उन्होंने सविस्तार बताया कि आने वाले दिनों मे कुबेर अपनी अनेक साहित्यिक योजनाओं को आकार देने वाले थे। तैयारी में जुटे थे, पूरे उत्साह के साथ... किंतु नियति की तैयारी तो कुछ और ही थी...
श्रद्धांजलि स्वरुप यहां उनकी यह हृदय-स्पर्शी कविता...
कवि-मुद्रा : कुबेरदत्त |
देह का सिंहनाद
कुबेरदत्त
यह मेरा
अपमानित, तिरस्कृत शव...
शव भी कहाँ-
जली हडडियों की केस प्रापर्टी,
मुर्दाघर में अधिक-अधिक मुर्दा होती...
चिकित्सा विज्ञान के
शीर्ष पुत्रों की अनुशोधक कैंचियों से बिंधी,
विधि-विधान के जामाताओं का
सन्निपात झेलती...
ढोती
शोध पर शोध पर शोध-
यह तिरस्कृत देह...
सामाजिकों की दुनिया से
जबरन बहिष्कृत
अख़बारनवीसी के पांडव दरबार में नग्न पड़ी
यह कार्बन काया-
मुर्दाघर में अधिक-अधिक मुर्दा होती...
भाषा के मदारियों की डुगडुगी सुनती...
कट-कट
जल-जल
फुँक-फुँक कर भी
पहुँच नहीं पाती पृथ्वी की गोद तक...
न बची मैं
न देह
न शव...
भूमंडलीकरण की रासलीला के बीच
लावारिस मैं
अधिक-अधिक मुर्दा होती...
झेलती
पोस्ट-पोस्ट पोस्टमार्टम
उत्तर कोई नहीं
न आधुनिक, न उत्तर आधुनिक
न प्राचीन...
क्या
मुर्दों के किसी प्रश्न का
कोई उत्तर नहीं होता?
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