श्याम बिहारी श्यामल की ग़ज़ल - ११७


बहती गंगा में हाथ धोना था 

श्याम बिहारी श्यामल 

महफूज कहां कोई कोना था
अब तो इसी बात का रोना था


हर चेहरा उनका डरावना था
बदहालात को अब ढोना था


क़ाबिज हुए वह कहां-कहां नहीं 
उनकी चाँदी उनका सोना था


सच पहनते झूठ को जीते थे 
तो इंसाफ़ कहां अब होना था

उन्हें पता था रास्ता साफ़ है  
बहती गंगा में हाथ धोना था 


श्यामल लोग कैसे शातिर थे 
कुछ भी कहना खुद को खोना था
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About Shyam Bihari Shyamal

Chief Sub-Editor at Dainik Jagaran, Poet, the writer of Agnipurush and Dhapel.
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